Sweta Singh is a journalist and news presenter. She is currently working at Aaj Tak. She worked for Zee News and Sahara, before joining Aaj Tak in 2002. You can folloW her on twitter at @sweta

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सबसे पहले अपने एजुकेशनल जर्नी के बारे में बताएं? पटना विमेंस कॉलेज में आपका अनुभव कैसा रहा?

मैंने अपना प्राईमरी एजुकेशन ईलाहाबाद से किया. उसके बाद सीनियर स्कूल पटना से किया. मैं पत्रकारिता नहीं करना चाहती थी. मजबूरी में करना पड़ा था. क्यूंकि उन दिनों पटना यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन पांच साल में हुआ करता था और जो मास कम्युनिकेशन का कोर्स था, उसमें मेरे कॉलेज को स्वायत्तता थी. यूजीसी ने उस दौरान स्वायत्तता देने की शुरुआत की थी. इस वजह से हमारा पत्रकारिता का कोर्स तीन साल में ही हो गया. मेरा इंटरेस्ट पत्रकारिता में बिलकुल नहीं था. आज भी नहीं है.

पटना विमेंस कॉलेज एक मिशनरी कॉलेज था. मिशिनरी कॉलेजों में सामान्यतः ननों का पूरा दखल रहता है, और यूनिवर्सिटी से उतना डायरेक्ट लेना-देना नहीं होता है. तो पहले भी बहुत अच्छा था. वो बहुत ही पुराना कॉलेज है. (यह 1940 में स्थापित हुआ था) इंडिया की पहली कमर्शियल पायलट भी वहीं से पढ़ कर निकली है. इंडियन वीमेन क्रिकेट टीम की ज्यादातर प्लेयर भी वहीं से पढ़ के निकलीं हैं. तो वो कॉलेज हमेशा से अच्छा रहा था.

आपकी पहली नौकरी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में थी?

नौकरी नहीं मिली थी. स्टूडेंट के तौर पर हमलोगों को फ्रीलान्स आर्टिकल लिखने की इजाजत थी वहां पर. मेरा पहला बाइलाइन पब्लिश हुआ था टाइम्स ऑफ़ इंडिया में. उसके साथ ही मैंने फ्रीलान्स हिंदुस्तान टाइम्स के लिए भी अगले साल से शुरू कर दिया था. तो क्यूंकि उन लोगों को पसंद आया. आर्टिकल्स लिखने का तरीका. तो वो लोग बार-बार असाइनमेंट्स दिया करते थे. तो फ्रीलान्स था मेरा उन दोनों के साथ. नौकरी नहीं थी. नौकरी ग्रेजुएशन के बाद ही हुई पहली.

आपकी पहली बाइलाइन किस विषय पर लिखी थी?

एक सर्वे हुआ था वहां पर. बिहार के असेंबली इलेक्शन होने थे. और लालू यादव का सेकंड टर्म था. और उसपे एक बुजुर्ग महिला ने कहा था कि वह लालू को पहचानती नहीं है. तो उसको उनलोगों ने प्रमुखता से पहले पन्ने पर छापा था. तो उसमें मिला था मुझे पहला बाइलाइन.

पटना से दिल्ली कैसे आना हुआ?

मेरे पापा का ट्रान्सफर हो गया दिल्ली और इस वजह से मुझे दिल्ली आना पड़ा. मैं छोड़ना नहीं चाहती थी पटना.

आपने जब पत्रकारिता की पढ़ाई की उस समय यह मुख्य धारा में नहीं था और ऐसा माहौल नहीं था शायद कि एक लड़की पत्रकारिता की पढ़ाई करे. तो उस समय घरवालों की क्या राय थी?

मैंने जब मास कम्युनिकेशन लिया उस वक्त तो लड़के भी नहीं आते थे मास कम्युनिकेशन में. मेरे घर में सब यहीं चाहते थे कि मैं UPSC की परीक्षा दूं. लेकिन मैं नहीं चाहती थी. तो UPSC के एग्जाम के नाम पर मैंने वो तीन साल का ग्रेजुएशन कर लिया. मैंने कहा कि मैं मास कम्युनिकेशन ही कर लेती हूँ. लेकिन उन लोगों को ज्यादा इंटरेस्ट इस चीज में था कि मैं साथ में इंग्लिश और इकोनॉमिक्स भी पढ़ रही थी. मैं हमेशा से पढ़ाई में बहुत ज्यादा इंटरेस्टेड थी. तो इकोनॉमिक्स में, +2 में, मेरी आल इंडिया रैंकिंग थी – नंबर वन. उस टाइम उतना हाथ खोल के मार्क्स नहीं मिलता था बावजूद मुझे 96% था इकोनॉमिक्स में. तो मेरे सब्सिडियरी सब्जेक्ट में मेरे घर वालों को ज्यादा इंटरेस्ट था. पर किस्मत थी कि मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन था, नौकरी मिलती चली गई और इस वजह से मैंने आगे इसे जारी रखा.

दिल्ली में आपकी सबसे पहली नौकरी कौन सी थी?

दिल्ली आकर मैंने सहारा न्यूज़ से शुरुआत की. वहां पर सिर्फ एक ही बुलेटिन हुआ करता था. वो लोग एक चैनल ला रहे थे. तो उसकी हायरिंग हो रही थी. जी न्यूज़ का भी एक ही बुलेटिन हुआ करता था. NDTV छोड़ कर. उस वक्त वैसे तो कोई भी 24 घंटे का चैनल नहीं था. एक बुलेटिन का होता था. बहुत अलग था. लाइव कुछ भी नहीं जाता था. लेकिन एक चैनल लांच करने का एक्सपीरियंस कैसा होता है, भले ही आप एक ट्रेनी रिपोर्टर के तौर पर वहां पर काम करते हो. लेकिन वो देखने को सीखने को बहुत कुछ मिल जाता था.

सहारा और जी न्यूज़ के काम करने के तरीके में कितना अंतर था?

सहारा में बहुत फैमिली एनवायरनमेंट था. जी न्यूज़ में वो बहुत प्रोफेशनल एनवायरनमेंट हो जाता था. सहारा को हमेशा परिवार कहा जाता था. जी न्यूज़ पूरी तरह से कमर्शियल इंटरेस्ट वाला था. अचानक आप सहारा में काम कर रहें हैं जहाँ पर काम को एक ग्रुप किस तरीके से एप्रोच कर रहा है वो था और जी में जाकर अचानक आपको टी आर पी के बारे में पता चलता है. बेसिक फर्क यह था.

आपका आज तक में कैसे आना हुआ?

जब आप एक प्रतियोगी वातावरण में आ जाते हैं तो आपको ऑफर्स आने लगते हैं. जी न्यूज़ में काम करते हुए मुझे आज तक से ऑफर आया था . इस वजह से मैं आज तक में आ गई.

आज तक में आपका अब तक अनुभव कैसा रहा?

आज तक हमेशा से नंबर वन रहा है. सबसे प्रतियोगी, सबसे प्रोफेशनल चैनल है. और यहाँ पर कभी भी ऐसा नहीं होता है कि कोई चीज गंभीर रूप से प्रशंसित है तो टी आर पी से समझौता कर लो या आपको टी आर पी मिल रही है तो गंभीर रूप से प्रशंसित चीज पर समझौता कर लो. यहाँ पर हमेशा आपको पुश करके एक ऐसे चीज के लिए मोटिवेट किया जाता है जहाँ पर आपको तारीफ भी मिले और आपको देखने वाले लोग भी मिलें. तो जब आपको कोई हर तरह से सपोर्ट कर रहा हो बेस्ट होने के लिए तो किसी भी प्रोफेशनल इन्सान के लिए वो एनवायरनमेंट बेस्ट होता है.

टीवी में काम करने में किस तरह की दिक्कतें आती हैं. इसमें काम करने के फायदे और नुकसान क्या-क्या हैं?

अगर मन है तो टीवी में काम करना चाहिए. अगर अन्दर से कोई आवाज आई है. पत्रकारिता मेरी पहली पसंद कभी नहीं थी. लेकिन विजुअल मीडियम मेरा पहला पसंद था हमेशा से. चाहे मैं उस से सिलोलाइड पर काम कर सकती या फिर एंटरटेनमेंट में काम कर सकती या फिर न्यूज़. टेलीविजन की भाषा मुझे पसंद थी. और इसीलिए अगर कोई भी उसमे काम करना चाहता है तो मुझे लगता है कि फायदा नुकसान तभी होता है जब आप उसको करना चाहते हैं या नहीं करना चाहते हैं. मैं करना चाहती थी इसलिए मुझे उसका नुकसान कभी नजर नहीं आया.

काम करते हुए चुनौतियां किस प्रकार की आती हैं?

मुझे करीब-करीब 23 साल हो गए काम करते हुए. इसलिए यह मेरे सिस्टम में आ चुका है. टाइम बाउंड होता है. आप कभी भी रिलैक्स नहीं कर सकते हैं. लेकिन अगर आपको करने का मन है, तो जो मुश्किल भी है, वो भी आपको आसान ही हमेशा लगेगा.

मैंने कहीं पढ़ा कि आप डाक्यूमेंट्री बनाना चाहती थीं?

नहीं, मैं फिल्म्स बनाना चाहती थीं. मैं टीवी के सामने कभी नहीं आना चाहती थी. हमेशा कैमरे के पीछे रहना चाहती थी. आज भी कैमरे के पीछे वाला काम मुझे ज्यादा पसंद है.

तो आपने फिल्म को चुना नहीं या मौका नहीं मिला?

मुझे फिल्म बनाने का मौका नहीं मिला. उसके लिए मुंबई जाना होता. और मेरे माता-पिता चाहते थे कि मैं उनके साथ ही रहूँ,अपने काम करने के दौरान भी. क्यूँकि उनका ट्रान्सफर दिल्ली हुआ, मुंबई नहीं, तो इस वजह से मुझे न्यूज़ की तरफ आना पड़ा. दिल्ली में बिलकुल भी आपके पास गुंजाइश नहीं है कि आप इंटरटेनमेंट से जुड़ा हुआ कोई काम कर सकें.

जो स्टूडेंट्स ब्राडकास्टिंग जर्नलिज्म में करियर बनाना चाहते हैं उन्हें किन चीजों पर ध्यान रखना चाहिए?

अपने लिए वक्त भूल जाएँ. क्यूंकि यह एक चौबीस घंटे का काम है. और बहुत पढ़ना होता है, हमेशा. रोज आपको ना सिर्फ अख़बार, बल्कि नई चीजों के बारे में जानना होगा. उसके साथ ही इतिहास के बारे में भी जानना होगा. कोई भी एक चीज अगर हुई है तो उसका बैकग्राउंड, उसका वर्तमान और उसके भविष्य के निहितार्थ, हर चीज के बारे में. यानी मुझे लगता है कि जिसमें जितनी ज्यादा जिज्ञाषा होगी, वह उतना बेहतर पत्रकार बन सकता है.

टीवी में अभी रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता के लिए कितना स्कोप है?

टीवी में रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती है और अनुभव की बहुत बड़ी जगह होती है. तो इसका सीधा मतलब हो जाता है कि जितने भी रिपोर्टर्स या एंकर हैं इस फील्ड में वो आज की तारीख में रिटायर कर नहीं रहे हैं. उनका अनुभव बढ़ रहा है तो नैचुरली उन्हीं का डिमांड बढ़ रहा है. जो जितना पुराना रिपोर्टर होता जायेगा वो उतना बेहतर और निखरता जायेगा. इस वजह से आज की तारीख में रिपोर्टिंग में बहुत-बहुत कम जगह है. और इसके साथ ही मैं हमेशा मानती हूँ कि जिसमें टैलेंट होता है उसको रोकने वाला कोई नहीं है. भले ही जगह बहुत कम हैं, शायद ईक्का-दुक्का मिल जायेंगे. लेकिन जिसमें वो बात होगी, वो टैलेंट होगा, तो उसके लिए हमेशा जगह रहेगी.

हिन्दी पत्रकारों को इंग्लिश पत्रकारों की तुलना में काफी कम पैसे मिलते हैं…

सैलरी में अंतर नहीं है. हिन्दी हमेशा देखा ज्यादा जाता है हमारे देश में. लेकिन इंग्लिश को कुछ लोग जो महत्व रखते हैं, जैसे अर्थशास्त्री, राजनेता वो थोड़ा ज्यादा महत्व दे देते हैं. लेकिन जो देखने वाले हैं वो 100 : 1 का रेशियो है. हिन्दी और इंग्लिश में. हिन्दी समाचार अगर 100 लोग देखते हैं तो 1 उसमें से देखेगा इंग्लिश. लेकिन सैलरी बराबर है. सैलरी में कोई अंतर नहीं है.

ऐसा कहा जाता है कि टीवी में जो बहसें होती हैं वह पूरी हवा-हवाई हो गई है. मतलब आप एक घंटा देख लो आपको समझ ही नहीं आएगा कि हुआ क्या? आप इसे कैसे देखती हैं?

हाँ मैं इत्तेफाक रखती हूँ. मुझे बहस पसंद नहीं है. मुझे विश्लेषण ज्यादा पसंद है. जब आप चार गेस्ट रखते हैं, चारों एक साथ बोलेंगे, जब तक हल्ला नहीं होगा, तब तक देखने वाला भी कहेगा कि मजा नहीं आया. तो एक दर्शक के तौर पर मैं बता रही हूँ यह चीज. मुझे खुद नहीं पसंद है डिबेट शोज देखना. और एक एंकर के तौर पर भी मैं बहुत ज्यादा एन्जॉय नहीं करती इसे. क्यूंकि आप इससे कुछ लेकर नहीं जा सकते. कुछ भी ऐसा एक्स्ट्रा नहीं है जो आप सीख रहे हों, समझ रहे हो. बड़े पुराने रटे-रटाए तर्क-वितर्क, वह भी एक साथ बोलते हुए विशेषज्ञ.

हजारों स्टूडेंट्स जो आपको एक प्रेरणा स्रोत की तरह देखते हैं उन्हें आप क्या कहेंगे?

जो दिख रहा है उसकी तरफ ना जाएं . यानी एंकर सिर्फ एक परसेंट हैं, एक चैनल में जो काम होता है उसका. तो पत्रकारिता में आना है तो इस वजह से ना आयें की आपका बाइलाइन चलेगा या उनका चेहरा दिखेगा. बल्की इस वजह से आयें की उन्हें पत्रकारिता पसंद है. कई बार आप इंटरव्यूज के लिए आयेंगे और आपसे पूछा जायेगा कि आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं. आप कहेंगे आप समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. तो कई बार आपके वरिष्ठ आपका मजाक भी उड़ा देते हैं. लेकिन उस वक्त आपको उस दृढ विश्वास पर बने रहना है, कि हाँ, मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ और इसीलिए मैं आ रहा हूँ पत्रकारिता में. चाहे आप समाज को ज्ञान देना चाहते हैं, चाहे समाज को दिशा देना चाहते हैं, चाहे आप समाज को सुधारना चाहते हैं. लेकिन वजह सिर्फ वहीं हो सकती है. वजह अगर कोई और हुई तो आप अपने काम में ना कभी खुश रहेंगे, ना कभी सफल होंगे.