फैसल मोहम्मद अली एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में बीबीसी हिन्दी के साथ काम कर रहे हैं. इससे पहले उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस और कुछ बिज़नस मीडिया घरानों के साथ काम किया है. acadman.in को दिए इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने शुरुआती दिनों, छोटे शहर से आने की परेशानी, इंडियन एक्सप्रेस में नौकरी मिलने से लेकर बीबीसी हिन्दी ज्वाइन करने तक का सफ़र साझा किया है और बीबीसी में नौकरी कैसे मिले पर सलाह भी दी है.


आप किस शहर से हैं? आप की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई?

मैं मुजफ्फरपुर, बिहार से आता हूं. मेरी ज्यादातर पढ़ाई बिहार के सीमावर्ती इलाके किशनगंज-कटिहार में हुई है. साइंस-मैथ मेरा कमजोर था और मुझे साहित्य पढ़ना पसंद था. मेरे चाचा उर्दू के कवि हुआ करते थे तो मैं उनसे थोड़ा इंस्पायर्ड था. कॉलेज में मैंने इंग्लिश लिटरेचर पढ़ा.

उस समय मालूम था कि पत्रकार बनना है?

हां, उस समय तक एक शौक पैदा हो गया था क्यूंकि मैं अखबार-मैगजीन पढ़ने लगा था. लेकिन इतना कोई फर्म ग्राउंड नहीं था. जिस जमाने में मैं बड़ा हो रहा था, उस समय पत्रकारिता का, खासकर प्रिंट का, बड़ा फ्लॉरिशिंग दौर था. बहुत सारी नई पत्रिकाएं आती थी. एक “जेंटलमैन” आती थी जिसमें लाल कृष्ण आडवानी जैसे लोग लिखा करते थे.

जब हम थोड़े बड़े हुए तो इमरजेंसी का दौर खत्म हुआ और उसके बाद काफी नई पत्रिकाएं-अखबारें उस जमाने में इमर्ज कर रही थीं. पत्रकारिता के लिए वह एक गोल्डन पीरियड जैसा था. उस समय की कई स्टोरीज मुझे आज तक याद है, जो उस समय इन्सपायर करती थी.

लेकिन जब मैंने कॉलेज में इंग्लिश लिया तो मेरा मन एकेडमिक्स में जाने का था. मुझे उस समय यह महसूस होता था कि मैं उतना स्मार्ट नहीं हूं कि मैं दूसरी नौकरियों (जिसमें बहुत ज्यादा पॉलिटिक्स है) में सर्वाइव कर पाउंगा.

लेकिन मैंने ग्रेजुएशन के बाद मास्टर्स नहीं किया क्यूंकि उस समय बिहार के कॉलेजों में सेशन दो-दो साल लेट हो रहे थें. और जैसा कि मैंने पहले बताया, पत्रकारिता उस समय फ्लॉरिश कर रही थी, नई मैगजीन्स-स्टोरीज इन्सपायर कर रही थी जिस वजह से मैं पत्रकारिता में आ गया.

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आपकी पहली नौकरी कौन सी थी? वहां कैसे पहुंचे?

पहली अच्छी नौकरी इंडियन एक्सप्रेस में थी जहां मैंने 1992 में ज्वाइन किया. वहां ऐसे जाना हुआ कि मैं नौकरी ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गया था और मैंने अश्विनी सरीन (एक बड़े पत्रकार, वह एक जमाने में मध्य प्रदेश से एक आदिवासी लड़की को खरीद कर ले आये थे यह साबित करने के लिए कि हां लड़कियां बेची और खरीदी जाती हैं भारत में. क्योंकि सरकार यह नकार रही थी. जिस पर कमला नाम की फिल्म भी बनी) से संपर्क किया और मैंने कहा कि मुझे काम चाहिए.

उन्होंने कहा तुम्हारे पास तो एक्सपीरियंस नहीं है. मैंने कहा कि नौकरी ही नहीं कोई दे रहा है तो एक्सपीरियंस कहां से आएगा. उसके पहले मैंने “स्टेसमन” में ट्रेनीशिप के लिए एग्जाम दिया था जिसमें मैं फेल कर गया था.

तो उन्होंने कहा कि कोई स्टोरी करके लाओ और पूछा कि कहीं बाहर भेजूंगा तो जाओगे? उस जमाने में श्रीलंका में सिविल वार चल रहा था. तो मैंने हिम्मत कर के बोल दिया कि आप मुझे श्रीलंका भेजेंगे तो मैं श्रीलंका भी चला जाऊंगा. तो वह हंसने लगे और कुछ स्टोरीज करने को कहा.

पहली स्टोरी मेरी छपी नहीं. लेकिन मेरी दूसरी स्टोरी उन्हें पसंद आई और इंडियन एक्सप्रेस में उसे दो दिन की सीरीज में छापा गया. हालांकि वह स्टोरी पूरी री-राइट की गई थी क्यूंकि मैंने अखबारों में छपने वाली भाषा में उसे नहीं लिखा था.

हम जैसे लोगों को, जो छोटे शहरों से आते हैं, उनको नौकरी मिलने में दिक्कत यह होती है कि आपके खिलाफ एक पूर्वाग्रह होता है. अब खत्म हुआ है वह हिन्दी पत्रकारिता के फ्लॉरिश करने की वजह से. तो उस समय जब हम अंग्रेजी अखबारों में जाते थे तो पहला सवाल होता था कि तुम्हारी डिग्री सच्ची है कि नहीं.

दूसरी दिक्कत यह होती है कि आपका कॉन्फिडेंस लेवल शहरों में पढ़े बच्चे जैसा नहीं होता. हम एक ठीक-ठाक फैमिली से आते थे और कोई ऐसी कमी नहीं थी. लेकिन एक खौफ था. किसी बड़े आदमी के पास जाने से घबराहट होती थी. सामने बैठा हुआ आदमी कोई आसान सा सवाल भी कर दे तो आप जवाब नहीं दे पाते हैं. या आप कुछ गलत जवाब दे देते हैं.

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बीबीसी हिन्दी में कैसे आना हुआ?

एक्सप्रेस के बाद 4-5 साल मैंने एक इकोनॉमिक न्यूज पेपर में काम किया. उसके बाद कई साल मैं टेलीविजन (बिजनस जर्नलिज्म) में रहा. उसके बाद मैं बीबीसी हिन्दी में आया.

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यह बहुत ही मुश्किल सवाल पूछा है आपने. इसका जवाब मैं दूंगा तो काफी लोग शायद नाराज भी होंगे मुझसे. जब मैंने जर्नलिज्म शुरू की उस समय प्रिंट मीडिया, खासकर अंग्रेजी मीडिया में बहुत अच्छा कल्चर हुआ करता था.

हिंदी मीडिया के बारे में मैं बहुत माफी के साथ उन लोगों को कहना चाहता हूं कि हिन्दी पत्रकारिता के बहुत बड़े लोग हुए हैं, उन्होंने हिंदी जर्नलिज्म को कभी “भैया जी” से आगे बढ़ने ही नहीं दिया. मतलब हमेशा एक चाटुकारिता, जिसको काम दिया है उसको यह एहसास दिलाना कि आप पर मैं बड़ा एहसान कर रहा हूं काम दे कर.

काम देकर कोई किसी के ऊपर एहसान थोड़े ही करता है. जो बड़े-बड़े नाम थे उन्होंने अपना यहां एक अजीब सा कल्चर बना रखा था कि वो चल रहे हैं तो उनके पीछे दस लोग और चल रहे हैं. यह अंग्रेजी में तब भी कम होता था.

जहां तक बीबीसी की बात है, बीबीसी और हिंदुस्तान की बाकी मीडिया में फर्क यही है कि नाइन्टीज के बाद हिन्दी के समाचार मीडिया के कम करने के तरीके में बहुत ज्यादा गिरावट आई है. हमारे वक्त में भी ऐसा होता था कि बॉस बुरा मान जाते थे, आपको डांट देते थे, लेकिन कोई गाली नहीं देता था.

हमारे अपने बॉस से बहस होती थी बहुत बार. शब्दों को लेकर, वाक्य के स्ट्रक्चर को लेकर, लेकिन किसी के खिलाफ किसी ने शिकायत नहीं की. लेकिन हिन्दी में आने के बाद एक अजीब सा कल्चर देखा, खासकर जब टीवी एक्सपैंड करने लगा, न्यूज़ रूम में बुरी तरीके से सीनियर लोगों को गाली दी जा रही है. बुरा भला कहा जा रहा है. बीबीसी में वैसा कुछ नहीं था. यहां सीनियर आपको बराबरी का अहसास कराते हैं.

मेरी लिए जो सबसे बड़ी बात है जिस लिए मैं इतने साल से यहां टिका हुआ हूं क्यूंकि पत्रकारिता की जो बेसिक कोर वैल्यू है, जो कमजोर है उसके साथ मैं खड़ा होना, वह मैं यहां कर पाता हूं.

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बीबीसी में नौकरी पाने के की चाह रखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

वह इंटरव्यू में पूछेंगे कि आप अपने बारे में बताइए. तो आपको यह बहुत क्लियर होना चाहिए कि आपने क्या-क्या किया है, अगर आपने अपने कॉलेज के पत्रिका में लिखा है, अगर आपने किसी अखबार में लिखा हो,  उन सब चीजों का हवाला दीजिये आप.

बेसिक अंग्रेजी की समझ होनी चाहिए. आपके थॉट प्रोसेस में एक क्लैरिटी होनी चाहिए. क्लैरिटी का मतलब आप वर्ल्ड अफेयर्स के बारे में जानें और उसके बारे में किसी को बताए तो समझ का घाल मेल ना लगे. आपको अपनी बात सामने वाले को सरलता से समझानी है. बेसिक जनरल नॉलेज से एजुकेटेड रहिये. कॉंफिडेंट रहिये. आपसे यह भी पूछा जा सकता है कि आपका दूसरे एम्प्लॉई से झगड़ा हो जायेगा तो आप क्या करेंगे?


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