के.जी सुरेश पिछले तीस सालों से भारतीय मीडिया में सक्रिय हैं. वर्तमान में के.जी सुरेश आईआईएमसी के महानिदेशक के तौर पर कार्यरत हैं. acadman.in को दिए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने अपने कॉलेज लाइफ, मीडिया एक्टिविज्म, IIMC में एडमिशन पाने के सलाह, मीडिया में इमरजेंसी, के अलावा कई और महत्वपूर्ण चीजों पर बात की है.


आपका जर्नलिज्म में इंटरेस्ट कैसे आया?

बचपन से मैं अखबार पढ़ता रहा हूं और लेटर टू द एडिटर लिखता था और हमेशा समाज में कुछ बदलाव लाने का जज्बा था मेरे अंदर. मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं IAS अफसर बनू पर मेरा समाज में परिवर्तन लाने का और लोगों में जागृति पैदा करने का जज्बा स्कूल के दिनों से ही था. मैं पत्रकार इसलिए नहीं बना कि मुझे और कुछ करने को नहीं मिला बल्कि मैं पत्रकार ही बनना चाहता था. इन फैक्ट मुझे एक सरकारी नौकरी भी मिल गई थी, उससे इस्तीफा देकर मैं पत्रकारिता में आया.

कॉलेज में आपकी लाइफ कैसे थी?

कॉलेज की लाइफ बहुत इंटरेस्टिंग थी. मैंने इंग्लिश लिटरेचर किया था, श्री वेंकटेश्वरा कॉलेज से. बहुत सारे कल्चरल और सोशल प्रोग्राम में मैं भाग लेता था. कॉलेज में मुझे दुनिया भर की काफी किताबें, बेहतरीन क्लासिक पढ़ने का मौका मिला और इससे मेरे नजरिए में काफी परिवर्तन आया.

आप खुद को मीडिया एडुकेटर मानते है या मीडिया एडमिनिस्ट्रेटर?

मीडिया एडमिनिस्ट्रेटर तो मैं अभी बना हूं, डेढ़ साल से. मूलतः मैं मीडिया परसन हूँ. पिछले 30 साल से मीडिया से जुड़ा हुआ हूँ. मैंने इसमें कई भूमिकाएँ निभाई है. उस में से 20 साल से तो मैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में ही पढ़ा रहा हूं. उससे पहले मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी था. मैंने माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर के तौर पर भी काम किया है और भी कई इंस्टिट्यूट में पढ़ाने जाता था. यह पत्रकार होने का ही एक्सटेंशन है. कोई पत्रकार जब सीनियर हो जाता  है, तो वह अपनी अगली पीढी को तैयार करने के लिए जिम्मेदार भी बनता है और मुझे लगता है मैं उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहा हूँ.

आपने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर खुद को मीडिया एक्टिविस्ट बताया है. यह क्या होता है?

मीडिया एक्टिविस्ट का मतलब अगर मैंने मीडिया की यथास्थिति को मान लिया है तो मैं एक्टिविस्ट नहीं हूं. मैं कोई पोलिटिकल एक्टिविस्ट नहीं हूं. मैं एक मीडिया एक्टिविस्ट हूं और मुझे लगता है कि मीडिया में भी परिवर्तन की जरूरत है. अक्सर हम सब मीडिया में रहकर मीडिया की आलोचना नहीं करते हैं. हम दूसरों पर तो उंगली उठाते हैं पर हम यह भूल जाते हैं कि जब हम दूसरों पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ भी उठी होती हैं.

एक मीडिया एक्टिविस्ट होने के नाते मैं मीडिया में जो कमियां हैं उसको सुधारने की तरफ भी सोचता रहता हूँ की हमारे मीडिया में क्या कमी है. यह लोकतंत्र का जो चौथा स्तम्भ है. उस रूप में सस्क्त और सक्रिय रूप से हम लोकतंत्र को कैसे मजबूत कर सकते हैं. मैं मीडिया की कमियों के बारे में जागरूकता पैदा करता हूँ, यहाँ बदलाव का हमेशा मेरा प्रयास रहता है.

मैं मीडिया क्रिटिक भी हूं. अक्सर मैं मीडिया की आलोचना करता हूं क्योंकि मैं समझता हूँ कि वह बहुत जरुरी है. मीडिया को भी एक आईना दिखाने की जरूरत है और यह काम मैं कई सालों से कर रहा हूँ.

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जो स्टूडेंट IIMC में एडमिशन लेना चाहते हैं उनको किन बातों पे ध्यान देना चाहिए?

छात्रों में समाज के प्रति एक जागरूकता होनी चाहिए. इसको सिर्फ एक पैसा कमाने का जरिया, या फिर आजीविका के नज़रिये से नही देखना चाहिए. इस पेशे में आने के लिए आपके अंदर एक जज्बा होना चाहिए, एक दर्द होना चाहिए की कई चीजें गलत हो रही है, उसको मुझे सही करना है.

हमारा देश विकासशील देश है, यहां पर आज भी जनता में जागरूकता नहीं है, ना अपने अधिकारों के प्रति, ना ही समाज के प्रति. अगर समाज के प्रति संवेदना नहीं है तो आप पत्रकार बनने लायक नहीं हैं. आपके भीतर समाज के प्रति, खासकर जो कमजोर वर्ग है, पिछड़े वर्ग है, उनके प्रति एक संवेदना होनी चाहिए. एक जज्बा होना चाहिए. भाषा पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए, चाहे वह कोई भी भाषा हो. जनरल नॉलेज अच्छी होनी चाहिए.

जीवन के हर क्षेत्र के बारे में रुचि होना चाहिए. उदासीन व्यक्ति अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता है. ठीक है, मुझे स्पोर्ट्स में कम इंटरेस्ट हो, तो भी स्पोर्ट्स के बारे में मुझे जानकारी होनी चाहिए. राजनीति में कम इंटरेस्ट हो सकता है कुछ लोगो का, लेकिन राजनीति के बारे में कोई बिलकुल अनभिज्ञ रहे, ऐसा व्यक्ति पत्रकार नहीं बन सकता हैं.

मतलब किसी भी छात्र को किसी भी क्षेत्र के बारे में उदासीन नहीं होना चाहिए.क्योंकि मीडिया एक ऐसी जगह है जहां पर आपको कोई भी काम दिया जा सकता है. कोई भी खबर,कहीं से भी निकल सकती है. A journalist has to be a generalist.

नियमित तौर पर अख़बार पढना चाहिए. मीडिया का एक्सपोज़र होना चाहिए. खबर में रूचि होनी चाहिए. मेरे पास अक्सर कई ऐसे स्टूडेंट्स इंटरव्यू के लिए आते हैं जो अख़बार नहीं पढ़ते हैं, मैं उसी बेस पर उनको डिस-क्वालीफाई कर देता हूं. आप पत्रकारिता में आना चाहते हैं और अख़बार नहीं पढ़ते हैं, तो फिर आप किस बात के लिए आ रहे हैं.

काफी पत्रकारों ने acadman.in को बताया है कि IIMC में जो पढाया जाता है और जो न्यूज़रूम में काम होता है, उसमें जमीनआसमान का अंतर हैआपकी क्या राय है?

नहीं, इतना तो मैं नहीं समझता हूं. यह उन्हीं इंस्टिट्यूट पर लागू है जहां आप इंडस्ट्री के साथ इंटरफ़ेस नहीं हुए हैं. IIMC में इंडस्ट्री के साथ काफी इंटरफ़ेस है. इंडस्ट्री के लोगों को ही हम अक्सर बुलाते हैं. थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों अपनी जगह जरुरी है. हम इंडस्ट्री के लोगों को बुलाते हैं, जो अभी काम कर रहें हैं, ताकि वह लोग छात्रों को एक्सपोजर दें सकें.

तो बहुत ज्यादा फर्क तो नहीं मैं कहूँगा. हां मगर थोड़ा-बहुत आदर्शवाद तो होता ही है और वह अगर नहीं सिखाएंगे तो आदर्श कहां रहेंगे. मैं समझता हूं कि हर पेशे में कुछ आदर्श होने चाहिए और यह आदर्श केवल क्लास रूम में ही सिखाए जा सकते हैं. आप नौकरी करते हुए इसे नहीं सीख सकते हैं. वहां आपको हर किस्म के लोग मिलेंगे.

लेकिन अगर कुछ आदर्श हम सिखाकर भेजते हैं और वह आदर्श अगर जिंदा रहता है तो वह भविष्य के लिए एक निवेश है और भविष्य के लिए ऐसा निवेश भी जरूरी है. अगर सब कुछ व्यवहारिक कर दे, तो अब पेडन्यूज़ भी व्यवहारिक बन गया है. हम IIMC में  पेड न्यूज़ तो नहीं सिखा सकते. हमारी अपनी सीमाएं हैं. सब कुछ सिखाकर हम नहीं भेज पाएंगे.

आज-तक के एक पत्रकार ने acadman.in को अपने इंटरव्यू में बताया की IIMC में एडमिशन के लिए आज भी सिफारिश की ज़रुरत होती है.

मैं इस चीज को पूरी तरीके से खारिज करता हूं कि यहां सिफारिशें चलती है. यहां पर आने के लिए एक ऑल इंडिया एंट्रेंस टेस्ट होता है उसमें हमारा कोई रोल नहीं होता और हमें तो यह भी नहीं पता होता है कि वह पेपर किसके पास जाते हैं. 85 नंबर हम रिटेन टेस्ट में देते है और केवल 15 मार्क्स का इंटरव्यू होता है. 15 मार्क्स  के लिए भी पूरी इंटरव्यू बोर्ड (3-4 लोग) बैठते है, अलग-अलग क्षेत्रों से लोग होते हैं और वह तय करते हैं किसी छात्र को 15 में से कितने नंबर मिलने चाहिए. कोई एक व्यक्ती तय नहीं करता और इंटरव्यू बोर्ड एडमिशन तय भी नहीं करता. अगर किसी बच्चे ने रिटेन एग्जाम में 80 नंबर ले लिए हैं और इंटरव्यू बोर्ड ने उसे 0 दे दिया है तब भी वह पास हो जाएगा. इंटरव्यू बोर्ड की कोई निर्णायक भूमिका नहीं है.

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अगर आपको भारत में हो रही पत्रकारिता की एक संक्षिप्त समीक्षा करनी हो तो आप कैसे करेंगे?

भारतीय पत्रकारिता ने बहुत ही सराहनीय आयाम दिए हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है. बड़े-बड़े स्तरों पर होने वाले भ्रष्टाचार को भारतीय पत्रकार सामने लाए है, कई जगह लोगों के अधिकारों का हनन, कई जगह ताकत के आधार पर हुई बदसलूकी को हमने एक्सपोज किया है. मीडिया ने बहुत अच्छे काम किये हैं. विकास के प्रक्रिया में मीडिया की एक अहम भूमिका रही है.

लेकिन यह भी एक हकीकत है कि पिछले कई दशकों में इसमें बहुत बदलाव आए हैं. इसमें मुनाफाखोरी भी होने लगी है. इसका कॉर्पोरेटाईजेसन भी हुआ है. इसमें कुछ गलत लोग भी आ गए हैं. तो किसी दुसरे प्रोफेशन की तरह इसमें भी कई कमियां आई हैं.

कुछ पत्रकार ऐसा बोलते है की मीडिया में अभी इमरजेंसी जैसा माहौल है. आप की क्या राय हैं.

मैं इस से सहमत नहीं हूं. यह वह लोग बोलते हैं जिन्होंने इमरजेंसी को देखा नहीं है. यह वही लोग बोल रहें हैं जो अनिभिज्ञ हैं आपातकाल के बारे में, जिन्होंने आपातकाल को महसुस करना तो छोड़िए ,आपातकाल के बारे में अध्यन भी नहीं किया. अज्ञानी लोग इस तरह की बात करते है.

आपातकाल जिन्होंने देखा है या अनुभव किया है, वह जानते हैं कि आपातकाल में जब पत्रकारों को बंद किया जाता था और वो अखबार निकाल नहीं पाते थे और एक पुलिस इंस्पेक्टर जनरल अख़बार का मुख्य संपादक होता था और पुलिस स्टेशन के कांस्टेबल और इंस्पेक्टर लोग तय करते थे की कौनसी खबर छपनी चाहिए. मुझे नहीं लगता की आपातकाल जैसी स्थिति अभी है या आगे कभी आएगी.

IIMC की यूनिक बाते क्या है?

आईआईएमसी में बहुत अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर है. आईआईएमसी का 52 साल का एक इतिहास है. यहां पर हमारे पास काफी अच्छी फैकल्टी है. हमारा एक अच्छा इंडस्ट्री इंटरफ़ेस है. हमारे पास अपना स्टूडियो है. हमारा अपना कम्युनिटी रेडियो स्टेशन है.

जो सुविधाएं हमारे यहां हैं, जो माहौल हमारे यहां पर है, यह बहुत कम संस्थानों के पास है. हमारा करिकुलम बाकी संस्थानों से बहुत अलग है. हम एक छात्र को केवल प्रोफेशनल तरीके से ही तैयार करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर भी काम करते हैं. तो जो एक्सपोजर IIMC में मिलता है, वह बहुत कम संस्थानों में मिलता है.

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क्या IIMC में शिक्षको की जितनी संख्या होनी चाहिए, उतनी है?

हमारे यहाँ जो positions हैं, उस हिसाब से तो IIMC में संख्या कम है. उसको हम ठीक करने की कोशिश कर रहें हैं.

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग काफी नीचे है इसके कारण आप क्या मानते हैं?

मैं उस इंडेक्स को नहीं मानता हूँ. वह इंडेक्स पाश्चात्य मापदंडों से बना हुआ है और मैं उसे बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देता हूँ. मैं समझता हूं कि उनके मापदंड ठीक नहीं है. वह उनकी कमी है. भारत की मीडिया आज भी विश्व के बेहतरीन मीडिया में से एक है.

IIMC में बॉयज हॉस्टल बनाने को लेकर कोई डेवलपमेंट हुए है क्या?

हॉस्टल के लिए हमारा प्रपोजल है. लेकिन सेंट्रल एंपावरमेंट कमेटी और सुप्रीम कोर्ट ने जो नियुक्त किया है, यहां के पर्यावरण को देखते हुए, उन्होंने जेएनयू के पूरे इलाके को रिजर्व फारेस्ट कहा है और किसी तरह के निर्माण पर रोक लगाई है. नहीं तो हमारे पास पैसा भी तैयार है, डिजाइन भी तैयार है, प्रपोजल भी तैयार हैं. पर हमें हॉस्टल बनाने की अनुमति नहीं मिल पा रही है.

अगर सरकारी वेतन पा रहा शिक्षक सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में समर्थन देता है तो ये कितना सही है?

आईआईएमसी को सरकार फंड करती है. कम से कम इस वक्त तो हम यूनिवर्सिटी नहीं हैं. जब हम यूनिवर्सिटी नहीं हैं तो सरकारी संस्था होने के नाते इसके कुछ नियम कानून हैं. उसका तो पालन करना ही होगा और नियम-कानून लोगों को रोकने के लिए नहीं होता है. वह पारदर्शिता के लिए होता है. मनमानी खत्म करने के लिए होता है.

पत्रकार बनने की चाह रखने वाले स्टूडेंट्स के लिए आपका मैसेज क्या होगा?

मैं तो यही कहूंगा कि हमेशा अध्ययन करते रहो. हमेशा पढ़ते रहो. मैं हमेशा कहता हूं कि हम पढ़े बगैर लिख रहे हैं और सुने बगैर बोल रहे हैं. तो पढ़ना जरुरी है, सुनना जरूरी है. एक सकारात्मक रूख होना चाहिए पत्रकारिता के प्रति, सिर्फ नकारात्मक ही देखेंगे…इन्सान कुत्ते को काटता है तभी खबर बनती है, कुत्ता इंसान को काटता है वह खबर नहीं है, यह जो पाश्चात्य सोच है. इससे हमें हटना पड़ेगा.

आज के समय में जो समाज में एक राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रहा है, उसको पत्रकारिता में प्रतिबिंबित नहीं होने देना चाहिए. अखबार के जो खबर के पन्ने हैं वो राजनीतिक नहीं होने चाहिए. विचार और समाचार का मिश्रण नहीं होना चाहिए. विचार के लिए ओपिनियन पेज है.

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