पत्रकारिता, समाजसेवा, और राजनीती – मोहम्मद अनस का acadman.in के आलोक आनंद से लम्बी बातचीत.


अनस, सबसे पहले आप अपने शुरुआती दिनों के बारे में थोडा बताएं?

मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि सामाजिक रही है. सोशल वर्क में परिवार के काफी लोग जुड़े रहे हैं. अखबार पढ़ने का चस्का बचपन में ही लग गया. घर में हिंदी उर्दू और अंग्रेजी अखबार आते थे. खबरें पढ़कर मन परेशान हो जाता था कि समाज में इतनी परेशानी क्यों है? देश में हालात इतने खराब क्यों हैं?

ग्रेजुएशन में जब पहुंचे तो ऐसे ही इत्तेफाकन पत्रकारिता चूज कर लिया. घरवाले चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं लेकिन मेरा मन था कि डॉक्टर नहीं कुछ और करते हैं. जिससे की आवाज उठा सके और मुझे लगा जर्नलिज्म एक अच्छा रास्ता होगा लोगों की आवाज उठाने के लिए.

अलाहाबाद से पत्रकारिता में ग्रेजुएशन किया. वहां समझ में आया कि हमने जो सोच रखा था वैसा कुछ है नहीं. गरीबों के लिए आवाज तो उठा सकते हैं लेकिन हालात बदलना तो सरकार का काम है. आप बस बता सकते हैं, चीजों को दिखा सकते हैं. तो मन बना लिया कि अब लोगों के लिए ही जीना है. अपने लिए तो सब कुछ है ही. अलाहाबाद से पत्रकारिता में ग्रेजुएशन के बाद मैं मास्टर्स के लिए माखनलाल विश्वविद्यालय – भोपाल चला गया.

माखनलाल विश्वविद्यालय में कैसा अनुभव रहा?

माखनलाल में प्रेक्टिकली बहुत कुछ सिखने को मिला. विश्वविद्यालय के पीछे ही तमाम मीडिया के ऑफिस थे. मेरे दिमाग में चल रहा था कि पत्रकारिता जन सेवा का कार्य है. लेकिन जब मैं इंस्टिट्यूट में पढ़ने गया तो वहां एक प्रोफेशनल वातावरण था. वहीं से मेरा मन ऊब गया कि नहीं मुझे नौकरी करके पत्रकारिता नहीं करनी है. मैं स्वतंत्र रुप से ही कुछ करूंगा.

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क्या आपको मुसलमान होने की वजह से कभी किसी भेदभाव का सामना करना पड़ा है?

एक मुस्लिम होने की वजह से माखनलाल में बहुत भेद-भाव झेला. वहां के कुछ प्रोफेसर, जो आज भी वहां मौजूद है, उन्होंने कई बार मेरे ऊपर धार्मिक टिप्पणियां की और तमाम तरीके से परेशान किया, दिमागी रूप से टॉर्चर करने की कोशिश की.

माखनलाल के शिक्षक ऐसा करते हैं?

वहां के टीचर्स खास करके जो RSS से जुड़े थे, वह बाकायदा क्लास से बाहर अपने ऑफिस मे बुलाकर तमाम तरह के टिप्पणियां किया करते थे कि आरएसएससे जुड़ जाइए, राष्ट्रवादी मुसलमान बन जाइए…देखिए हम एपीजे अब्दुल कलाम को अपना मानते हैं लेकिन आप औरंगजेब को मत मानिए. तो इस तरीके से बातें होती थी.

एक प्रोफेसर ने एक बार मुझे अपने दफ्तर में बुलाया और कहा की आप मुसलमानों की औकात ही क्या है? नरेंद्र मोदी जिस बस में सफर करते हैं उसके वाशरूम में भी वह किसी मुसलमान नेता को घुसने नहीं देते. इस तरीके की बातें… चिढ़ाना, धर्म को लेकर टिप्पणी करना और कई बार उन्होंने फ्रंट पर आकर भी मेरे खिलाफ छात्र को एकजुट करने की कोशिश की.

लेकिन मैं पहले से बहुत कुछ समझ चुका था तो परेशान नहीं हुआ बल्कि डटकर मुकाबला किया. वहां बहुत सारे साथियों का साथ भी मिला, लोग हिम्मत भी बढ़ाते थे, तो कभी नहीं लगा की वहां मैं अकेला हूं.

पढाई ख़त्म करने के बाद कई NGO के साथ जुड़ा और देश की अलग-अलग जगहों पर गया. युवाओं को समाज और राजनीति के बारे में जागृत करने कोशिश की.

Anas with NDTV Anchor – Ravish Kumar

 

आपने Rajiv Gandhi Institute for Contemporary Studies में रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम किया है. वहां कैसे पहुंचे?

वहां से ऑफर आया की आप हमारे यहां काम करले, आप राजनीति में इच्छुक हैं और समाज सेवा भी करना चाहते हैं, तो आइए कुछ राह दिखाइए. राजीव गांधी इंस्टिट्यूट में ऑफिसियली मैं रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम रहा था पर अन-ऑफिसियली राहुल गांधी की जो हिन्दी स्पीच लिखी जाती थी, उस पर हम लोगों का रिसर्च होता था..

राहुल गाँधी के साथ जुड़ने का अनुभव कैसा था?

बहुत अच्छा रहा. मैं अब तक राहुल से जुड़ा हूं. मैं बायस नहीं हो रहा हूं, लेकिन राहुल गांधी का जो व्यक्तित्व है वह बहुत सरल और सौम्य किस्म का है. राहुल हिंदुस्तान की वर्तमान जो राजनीति है उससे बिल्कुल उलट है. एक ओर जहां गुंडागर्दी, झूठ, भ्रष्टाचार है, वहीं दुसरी ओर राहुल कतार की आख़री व्यक्ती को ध्यान में रख कर चलते हैं.उनके अंदर इमोशन बहुत ज्यादा है. इस वजह से देश में जो अभी नया ट्रेंड है कि बेवकूफ बनाइए और कामयाब हो जाइए तो इसमें कहीं ना कहीं वह पिछड़े हुए हैं. जिस दिन उनको यह आ गया कि देश की जनता को किस तरह से बेवकूफ बनाया जाए तो शायद उस दिन उनको भी कामयाबी मिल जाएगी.

आजकल TV पर बहस चल रही है कि राहुल गांधी पीएम मेटेरियल है या नहीं. आपकी क्या राय है?

अभी राहुल के अन्दर उतनी परिपक्वता नहीं है. राहुल ने खुद को कभी भी प्रधानमंत्री पद के लिए पोट्रे नहीं किया है. यह टेलीविजन और लोगों की चर्चाएं हैं. मुझे वो एक पॉलिटिशियन के तौर पर ही ज्यादा बेहतर लगते हैं. शायद धीरे धीरे उनके अंदर वह चीजें आ जाए जो देश को लीड कर सके.

आपको शायद याद हो जब अपराधियों को लेकर उन्होंने एक बिल फाड़ कर फेंक दिया था जबकि पार्टी के अंदर ही लोग उनके खिलाफ थे कि नहीं इस तरह से नहीं करना चाहिए. लेकिन उन्होंने कहा नहीं मैं गुंडों को हटाना चाहता हूं. लालू यादव जो कि बहुत खास सपोर्टर थे यूपीए के उसी बिल की वजह से वह जेल गए या चुनाव नहीं लड़ सके हैं. कहीं ना कहीं आप समझ सकते हैं कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात थी यह.

अभी आप किसी मीडिया ऑर्गनाइजेशन से जुड़े हुए हैं क्या?

मैं इस वक्त बोलता हिंदुस्तान डॉट कॉम में एक कंसल्टिंग एडिटर के तौर पर कम कर रहा हूं.

अगर कोई जर्नलिज्म करना चाहता है तो कॉलेज चुनते वक्त किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

वह किसी से यूनिवर्सिटी से पढ़ ले जहा पर ज्यादा फीस ना लगती हो या फिर डिस्टेंस से ही कर ले. ज्यादा से ज्यादा अखबार, किताबे पढ़े. जितनी भी विचारधाराएं हैं उनके बारे में जानकारी ले. पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारिता का कोर्स करना बिल्कुल जरूरी नहीं है.

आज भारत में कैसी पत्रकारिता हो रही है?

आज का जो दौर है बहुत ही डरावना है. आपकी छोटी छोटी बातों को सरकार सर्विलांस में लेकर चल रही हैं. रवीश कुमार सरकार के टारगेट बने हुए हैं. गौरी लंकेश, कलबुर्गी की हत्या हो गई. जो कॉरपोरेट मीडिया है, जिसके बारे में कहा जाता था कि ना तो यह किसी की दुश्मन है और ना ही दोस्त, आज वह सभी सत्ता केंद्रित हो चुके हैं.

2014 से पहले की मीडिया सत्ता को घेरती थी. लेकिन 2014 के चुनाव के बाद वह मीडिया आज विपक्ष को घेर रही है. हर सवाल विपक्ष से कर रही है. अघोषित इमरजेंसी जैसा माहौल है. देश में विभिन्न फेसबुक पेज और एकाउंट्स ब्लॉक हो जाते हैं. मैं चार बार ब्लॉक हो चुका हूं. फेसबुक पर धर्म को, लोगों को, गलियां दी जाती है, जिनका कुछ नहीं होता. वहीं दुसरी ओर जब मैं जनता की आवाज उठा रहा हूँ, मुझे ब्लाक कर दिया जा रहा है.

फेसबुक का भारतीय सरकार से क्या लेना -देना?

जुकरबर्ग के साथ नरेन्द्र मोदी की जिस तरह से मुलाकाते हुई हैं, उसके बाद मुझे तो लगता है कि सरकार जिस चीज से घबराती है, फेसबुक को वह बहुत ज्यादा बुरा लग जाता है. सत्ता के खिलाफ बोलने वाले अकाउंट को सस्पेंड कर दिया जाता है. दिलीप मंडल का अकाउंट डिलीट कर दिया गया था. नेशनल दस्तक के फेसबुक पेज पर लिंक शेयर करना मना कर दिया गया. फेसबुक ने जो हमें स्वतंत्र रूप से आवाज उठाने का जरिया दिया था वह भी 2014 के बाद सवालों के घेरों में है.

(यह इंटरव्यू देने के ठीक बाद अनस का फेसबुक अकाउंट पांचवी बार ब्लाक हो गया जब उन्होंने लिखा: “कमल का फूल, हमारी भूल”. लेकिन फेसबुक को पब्लिक प्रेशर की वजह से अनस का अकाउंट 48 घंटे के भीतर अनब्लॉक करना पड़ा.)

भविष्य में कभी राजनीति में आना चाहते हैं?

हां, नि:संकोच. मेरी पहली पहचान एक पत्रकार के रूप में है. पूरी कोशिश करूंगा कि इमानदारी से पत्रकारिता करूं. ईमानदारी से मेरा जनसेवा का जो भाव है वह बना रहे. लेकिन अगर इससे कुछ हासिल नहीं होता है, इससे समाज को बहुत ज्यादा लाभ नहीं होता है, तो अंततः जिस से देश और समाज की दिशा और दशा तय होती है वह राजनीति है, तो में पूरी कोशिश करूँगा कि मैं एक ईमानदार राजनेता के तौर पर राजनीति में रहूँ.

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मीडिया के स्टूडेंट के लिए कोई मैसेज देना चाहते हैं?

हम जब बाहर रहते हैं तो पत्रकारिता और बदलाव के लिए बहुत क्रांतिकारी बने रहते हैं, पर अंदर आते ही 20-25 हजार की नौकरी के लिए 8 घंटा दे देते हैं. जो भी लोग पत्रकारिता मैं आना चाहते हैं पहले तो उनका विजन क्लियर होना चाहिए कि नौकरी करनी है या समाज सेवा करनी है. अगर नौकरी करनी है तो मेहनत करें, अपने नॉलेज को बढ़ाएं, अख़बार और पत्रिकाएं अच्छे से पढ़े, विचारधाराओं का अध्यन करे. अपने आप को मांझ ले की किसी के सामने बैठे तो जुबान बंद न हो.

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