Photo Credit: Mohd Imam

विकास कुमार वर्तमान में आज-तक में बतौर मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट काम कर रहें हैं. इससे पहले उन्होंने Catch न्यूज़ और तहलका के साथ काम किया है. acadman.in को दिए इस इंटरव्यू में उन्होंने गाँव में रेडियो पर बीबीसी सुनने से लेकर अब तक का सफ़र साझा किया है. उन्होंने पत्रकारिता में आने की चाह रखने वालों के लिए कुछ जरुरी सुझाव भी दिए हैं.


विकास, सबसे पहले आप अपने शुरुआती दिनों के बारे में थोडा बताइए.

मैं बिहार के वैशाली जिले के एक छोटे से गांव से हूं. मेरी शुरुआती पढ़ाई वहीं से हुई. उस समय मेरे घर पर बिजली भी नहीं थी. मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं साइंस में जाऊं, पर उसमें मेरा मन नहीं लगता था. मैं और मेरा भाई देर रात तक लालटेन जलाकर पढ़ाई किया करते थे. पापा शाम को घर आने के बाद किसी और के घर जाते थे और वह बताते थे कि – “हम BBC सुनने जा रहे हैं”.

तो उस समय सिर्फ यह तो पता था कि BBC एक न्यूज चैनल है जो न्यूज़ बताता है. मैंने भी जिद करके घर पर एक रेडियो मंगवा लिया. मैं भी बीबीसी सुनने लगा. तो उसी से मेरा इंटरेस्ट पत्रकारिता में आया.

डिबेट में मेरा इंटरेस्ट था. स्कूल में डिबेट कंपटीशन में भाग लिया. मेरी हिंदी की टीचर ने पहली बार मुझे सलाह दी कि तुम्हें पत्रकार बनना चाहिए.

वहां से पढाई ख़त्म करके मे दिल्ली आ गया. दिल्ली आकर मैंने आईआईएमसी का एग्जाम दिया. पर उसमें मेरा एडमिशन हो नहीं पाया और क्योंकि मुझे लौट के वापस जाना नहीं था, मैंने एक प्राइवेट इंस्टिट्यूट [International Institute of Mass Media] में एडमिशन ले लिया.

वहां से कोर्स खत्म करने के बाद मैंने एक दो छोटे-छोटे जगहों पर काम किया और फिर तहलका हिंदी से जुड़ा. मीडिया इंस्टिट्यूट में पढाई में मेरा मन कभी रहा नहीं. हमेशा से प्रेक्टिकल में पत्रकारिता करने का मन कर रहा था की कब रिपोर्टिंग का मौका मिल जाए और सही मायने में वो मौका तहलका ने दिया.

Vikas Kumar in his village

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तहलका में नौकरी कैसे मिली ?

तहलका में उस समय एक पेज पर ‘आप-बीती’ नाम से लिखा जाता था. उसमें ऐसा था कि अगर आपके साथ कोई घटना हुई है तो वह आप लिख कर भेजिए और वह पब्लिश होगी. तो मैंने भी वहां पर एक स्टोरी लिख कर भेजी और वह तहलका हिन्दी के आप-बीती पेज पर पब्लिश हो गई.

फिर वहां से मुझे एक कॉल आया. डेस्क वर्क की नौकरी मिल रही थी और मुझे डेस्क पर काम नहीं करना था. मैं फील्ड वर्क करना चाहता था. तो उसके लिए मैंने एक दोस्त की सिफरिश कर दी और वहां काम करने से मैंने मना कर दिया.

उस समय वहां संजय द्विवेदी थे जो मेरी इस बात से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने कहा कि जब फील्ड वर्क का कोई काम आएगा तो मैं तुम्हें जरूर कॉल करुंगा. फिर 2 महीने बाद मुझे फिर वहां से कॉल आया. और मैंने तहलका ज्वाइन की.

विकास, आपने तहलका क्यूँ छोड़ दिया?

तहलका मैंने छोड़ा नहीं. तहलका हमें मजबूरी में छोड़ना पड़ा. जब तरुण तेजपाल का केस हुआ और तहलका धीरे-धीरे गिरने लगा. उस केस के बाद एक साल तक मैं वहां बना रहा. इसी उम्मीद में कि तहलका फिर से उभर जाए.

दिल्ली में बने रहने के लिए आपको इकोनोमिकल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है. तहलका में सैलरी की दिक्कत शुरू हो गई थी. मैगजीन निकलना बंद हो गया था. कोई निकलना नहीं चाह रहा था पर हालात की वजह से निकलना पड़ा.

आप पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारिता की डिग्री को कितना जरुरी मानते हैं ?

मेरे अनुसार पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की डिग्री बिल्कुल जरूरत नहीं है. पत्रकार होने के लिए डिग्री नहीं, पत्रकार होना जरूरी है. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने पत्रकारिता की डिग्री नहीं ली हैं. पर वह आज बहुत ही अच्छी तरीके की पत्रकारिता कर रहे हैं. वहीं मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जनता हूँ जिन्होंने बहुत अच्छे संस्थानों से पत्रकारिता की पढ़ाई की है पर उनके अंदर एक जो पत्रकारिता की झलक होनी चाहिए, वह नहीं है.

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पत्रकारिता एक पागलपन वाला पेशा है. एक पीड़ित के पक्ष में खड़ा होने का जज्बा है. आजकल जर्नलिज्म की डिग्री के लिए दुनिया भर की लूट है. दुनिया भर के जर्नलिज्म इंस्टिट्यूट है. हर एक मीडिया संस्थान के अलग-अलग मीडिया इंस्टिट्यूट है जहां लाखों में फीस ली जाती है. लोग एक साल के लिए चार से पांच लाख रूपए दे देते हैं.

तो उन्हें मैं बता देना चाहता हूं कि पत्रकारिता में मत आइए. क्योंकि आपको वापस रिटर्न में इतना मिलने वाला नहीं है. जो लोग दो-चार चेहरों और कोर्ट-सूट पहने उस एंकर से आकर्षित होकर अगर पत्रकारिता में आना चाहते हैं, तो मत आइये.

अगर आप सिर्फ उन्ही को देखकर आ रहे हैं तो आपको सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी. अगर आप खबरें करना चाहते हैं, अगर आप अच्छी स्टोरीज करना चाहते हैं, अगर आपको लोगों की कहानी बताने में इंटरेस्ट है, तो आप पत्रकारिता में आइए.

आजकल बहुत सारे मीडिया इंस्टिट्यूट हो गए हैं तो पत्रिकारिता की डिग्री वालों को प्राथमिकता दी जाएगी और आपको सेकेंडरी माना जायेगा. पर डिग्री ही सबकुछ नहीं हैं. यह भी है कि आज जर्नलिज्म सिर्फ अखबारों और टीवी तक ही सीमित नहीं रह गया है. जर्नलिज्म का दौर बदल रहा है. अगर आप YouTube पर कोई चैनल बनाकर लोगों की स्टोरीज डाल रहे हैं, लोगों की कहानियां दिखा रहे हैं, तो वह भी आज जर्नलिज्म का हिस्सा है. तो वहां से भी आप  बहुत अच्छा काम कर सकते हैं जो आप किसी चैनल या न्यूज़पेपर में रहकर करेंगे.

जो लोग भी पत्रकारिता में आना चाहते हैं वह खुद अपने आप से पूछें कि वह पत्रकारिता मे क्यूँ आ रहे हैं. सिर्फ एंकर बनने के लिए आ रहे हैं तो वह एक मीडिया का छोटा सा हिस्सा है. सिर्फ एंकर ही मीडिया नहीं है. डिग्री महत्वपूर्ण है पर सिर्फ डिग्री ही सबकुछ नहीं हैं.

आज भारत में मीडिया कैसा काम कर रही है?

इंडिया में मीडिया कैसा काम कर रही है इससे ज्यादा यह जानना जरूरी है कि मीडिया का स्वरूप किस तरह बदल रहा है? वर्ल्ड वाइड फिनोमेना हो गया है कि लगभग आधे से ज्यादा लोगों का मेनस्ट्रीम मीडिया से विश्वास ही उठ गया है. लोगों की नजर में या तो मीडिया सरकार विरोधी है या सरकार के लिए काम कर रही है.

खास करके अगर इंडिया के बात करें तो हमेशा मीडिया में जो संपादक रहे हैं या जो मीडिया घरानों के मालिक रहे हैं वह किसी न किसी राजनीतिक घराने के करीब रहे हैं. यह कोई बड़ी बात नहीं हैं.

लेकिन एक पर्दा था जिससे की वह चीज उनके अख़बार, चैनल और लेखनी में नहीं दिखती थी. कई उदहारण ऐसे मिलते हैं जब एक एडिटर का एक राजनितिक पार्टी के नेताओं से बड़ा अच्छा संबंध रहा है. लेकिन उसके खिलाफ किसी रिपोर्टर ने कोई बहुत अच्छी रिपोर्ट लाकर दे दी तो उसे छाप भी दिया.

आज के दौर में मीडिया में भी एक खेमेबाजी हो गई है. किसी राजनीतिक पार्टी के पर्वक्ता की तौर पर बात करने में मीडिया को कोई हैरानी नहीं हो रही है, कोई लज्जा नहीं है, कोई शर्म नहीं है.

मेरा मानना है कि  TV से कहीं ज्यादा बेहतर पत्रकारिता अखबार और मैग्जींस कर रहे हैं. उनमें अच्छी रिपोर्टे छप रही हैं.

पत्रकारिता का एक मेन एलिमेंट रिपोर्टिंग है. ओपिनियन सेकेंडरी है. पर आज की मीडिया में रिपोर्टिंग धीरे-धीरे खत्म हो रही है. अगर थोड़ी-बहुत बची है तो अख़बारों  में. TV और वेब पर रिपोर्टिंग खत्म हो चुकी  हैं, वहां  सिर्फ ओपिनियन मेकिंग का कम होता है. टीवी का मीडिया सिर्फ दिल्ली तक सीमित है. दिल्ली के बाहर क्या हो रहा है उस तक पहुचने  में उसे बहुत दिन लग जाते है.

अभी आज-तक में आप की जिम्मेदारी क्या है?

मैं आजतक में फ़िलहाल मोबाईल स्टोरी टेलिंग पर काम कर रहा हूँ.

Vikas with his colleagues at Aaj Tak office

मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट बनने की चाह रखने वालों के लिए सलाह?

लिखने-पढने के हुनर के साथ-साथ थोड़ी टेक्निकल जानकारी भी होनी चाहिए. अब एक पत्रकार से आल-राउंडर होने की उम्मीद की जाती है.

बीबीसी हिन्दी सुनकर आपकी दिलचस्पी पत्रकारिता में आई. तो क्या आप बीबीसी में काम करने की चाहत रखते हैं?

मैं बीबीसी में काम करने की चाहत रखता हूँ और मुझे जब भी मौका मिलेगा मैं जरुर बीबीसी ज्वाइन करूँगा.

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