नीरज जाट पेशे से इंजीनियर हैं और घूमने का काफी शौक रखते हैं. इन्होंने भारत में सैकड़ों यात्रायें की हैं. नीरज ने भारतीय रेल में डेढ़ लाख किमी से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है.

acadman.in के साथ नीरज जाट ने अपने ट्रैवल एक्सपेरिएंस को लेकर काफी बातें की हैं. पढ़िए नीरज का acadman.in को दिया ये विशेष इंटरव्यू… इस इंटरव्यू में नीरज ने शुरुआती दिनों में घूमने का शौक डेवलप होने, सबसे यादगार यात्राओं से लेकर कई और दिलचस्प बातें की हैं.


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सबसे पहले आप अपने बारे में थोड़ा बताइए. आप किस शहर से ताल्लुक रखते हैं? आपने पढ़ाई कहां से, किस विषय में की? उस समय आपकी जिंदगी कैसी थी?

मैं उत्तर प्रदेश में मेरठ शहर से 12 किलोमीटर दूर दबथुवा गाँव का रहने वाला हूँ। हाई स्कूल के बाद मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर लिया। इसके बाद पढ़ाई नहीं की, बल्कि नौकरी करने लगा। डेढ़ साल गुड़गाँव और हरिद्वार में प्राइवेट नौकरी करने के बाद दिल्ली मेट्रो में जूनियर इंजीनियर के तौर पर सलेक्शन हो गया। तब से (2009 से) अब तक मैं दिल्ली मेट्रो में ही हूँ। पढ़ाई के दौरान ज़िंदगी कोई ज्यादा ख़ास नहीं थी। जैसी प्रत्येक विद्यार्थी की होती है, वैसी ही मेरी भी थी। स्कूल, घर, होमवर्क और सबकी डाँट। और हाँ, जन्मवर्ष: 1988.

घूमने के अलावा आप क्या करते हैं?

मेरा प्राथमिक शौक घूमना ही है। इसके अलावा मुझे अपने यात्रा-वृत्तांत लिखने का शौक है। ये यात्रा-वृत्तांत नियमित रूप से मेरे ब्लॉग के साथ-साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते हैं। फोटोग्राफी का भी शौक है, जो घूमते रहने के दौरान लगातार विकसित होता जा रहा है।

घूमने में दिलचस्पी कहां से आई?

पता नहीं… अपने आप आ गयी। वैसे मैं एक सामान्य टूरिस्ट ही होता, यदि ब्लॉग पर लेखन न करता। लगातार लेखन से जिम्मेदारियाँ भी बढ़ जाती हैं और घुमक्कड़ी के क्षेत्र में आसमान छूने की चाहत भी।

घर में किसी ने कभी मना नहीं किया की इतना मत घूमो?

कैसी बात करते हैं आप भी? भला ऐसा भी कोई घर है भारत में, जहाँ बच्चे को रोका न जाये। मुझे भी बहुत रोका गया। बहुत झगड़े हुए। लेकिन एक चीज मेरे पक्ष में थी। मेरा आत्मनिर्भर होना। जब तक मैं आत्मनिर्भर नहीं था, तब तक घूमने और अन्य किसी भी बात के लिये ज़िद नहीं की। लेकिन 2009 में दिल्ली आने के बाद जब आत्मनिर्भर हो गया, तो सब बदल गया। घर पर सबने मना किया। ऊपर से मेरा इंटरनेट पर लिखना। बच्चों का इंटरनेट पर चिपके रहना अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन धीरे-धीरे अख़बार में भी लेख आने लगे, सम्मानित भी किया जाने लगा, तो घरवालों का विरोध कम होने लगा। अब किसी का कोई भी विरोध नहीं है।

वो पहली जगह जहां आप अकेले घूमने गए थे. उसके बारे में बताए.

उत्तराखंड़ में मुक्तेश्वर के पास एक गाँव है – भागादेवली। वहाँ के दो भाई 2007 में मेरे साथ नौकरी करते थे। दीपावली की छुट्टियों में जब वे दोनों अपने गाँव गये हुए थे, तब अचानक मेरा भी मन करने लगा। इससे पहले कभी पहाड़ों पर नहीं गया था और अकेला भी नहीं गया था। यात्रा बहुत अच्छी तरह सम्पन्न हुई और इसके बाद अकेले जाने का सिलसिला आरंभ हो गया।

आपने भारत में काफी घूमा है. यह चुनना शायद कठिन होगा, फिर भी आप अपनी 5 सबसे यादगार यात्राओं के बारे में बताएं.

यह चुनाव बड़ा मुश्किल है, क्योंकि प्रत्येक यात्रा यादगार होती है। आप एक यादगार पूछते, तब भी बताना मुश्किल होता। पाँच यात्राओं के बारे में तो बताना और भी मुश्किल है। फिर भी आपने पूछा है तो बताना पड़ेगा:

  1. 2013 में जनवरी में लद्दाख यात्रा। इस यात्रा में मैंने चादर ट्रैक के दौरान माइनस तीस डिग्री तापमान में एक गुफा में अकेले रात बितायी थी, वो अनुभव अब भी ज्यों का त्यों याद है।
  2. 2013 में ही साइकिल से लद्दाख यात्रा। मैं साइकिलिस्ट कभी नहीं रहा। इससे पहले भी कोई ज्यादा साइकिल नहीं चलायी थी और इसके बाद भी नहीं। बड़ा शानदार अनुभव था।
  3. 2012 में तपोवन की यात्रा। गौमुख से आगे तपोवन है। बड़ा ही रमणीक और आध्यात्मिक स्थान। पाँच साल हो गये, लेकिन ऐसा लग रहा है, जैसे कल की ही बात हो।
  4. 2014 में मिज़ोरम की यात्रा। पूर्वोत्तर के बारे में हम ज्यादा नहीं जानते। मिज़ोरम पूर्वोत्तर में भी सुदूरतम है। आइजॉल से चम्फाई तक 200 किलोमीटर तक साइकिल से यात्रा की। स्थानीय लोगों के साथ रहे, जंगलों में भी रुके। एक अलग ही नज़रिया मिला पूर्वोत्तर को देखने का।
  5. इसके बारे में तो सोचना ही नहीं पड़ा। 2016 में एवरेस्ट बेस कैंप की यात्रा।

घूमना क्यों ज़रूरी है?

घूमना ज़रूरी नहीं है। लेकिन अपनी-अपनी ज़िंदगी जीना ज़रूरी है। घूमना भी ज़िंदगी जीने का एक तरीका है। आपकी रुचि घूमने में है, घूमिये। संगीत में है, तो गाईये-बजाईये। लिखने में है, लिखिये। अपनी रुचियों को पहचानना और उन्हें आत्मसात करना ज्यादा ज़रूरी है।

भारत के लोगों में घूमने का चलन नहीं है? इस पर आप क्या राय रखते हैं?

चलन है, लेकिन केवल तीर्थयात्रा का। अब तीर्थयात्रा से इतर भी घूमने का चलन युवाओं में बढ़ रहा है। यह अच्छी बात है।

स्टूडेंट्स के लिए सस्ते में घूमने के कुछ टिप्स?

सबसे पहला टिप – आत्मनिर्भर बनो। अपने पैरों पर खड़े होओ। उसके बाद ही घूमने का असली आनंद है। और सस्ते की बात है, तो स्थानीय लोगों से मेलजोल बढ़ाओ। यह मेलजोल बड़ा काम आता है। होटल की एड़वांस बुकिंग ज़रूरी नहीं है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आपको छत और भोजन नहीं मिलेगा। आपको हर जगह सबकुछ मिल जायेगा, बशर्ते आप उसे स्वीकार करने को तैयार हों। खुद पर भरोसा रखो।

भारत में ट्रैकिंग के लिए डिफिकल्ट लेवल के कुछ जगहों के नाम बताएं.

ऐसा कोई स्थायी लेवल नहीं है। जो ट्रैक मेरे लिये आसान है, वो आपके लिये कठिन हो सकता है। और इसका विपरीत भी उतना ही सत्य है। मौसम की भी अहम भूमिका होती है। बर्फ़ नहीं होगी, तो ट्रैक आसान हो सकता है। लेकिन बर्फ़ होगी तो वही ट्रैक मुश्किल हो जायेगा। फिर भी कुछ स्थानों के नाम बताना उचित है:

  1. आसान ट्रैक: नागटिब्बा, चंद्रखनी पास, त्रिउंड़, पिंड़ारी ग्लेशियर, हर की दून आदि। इसी में यमुनोत्री, गौमुख, केदारनाथ आदि भी आ जायेंगे।
  2. मध्यम ट्रैक: इसमें इंद्रहार पास, रूपकुंड़, मिलम ग्लेशियर, तपोवन आदि आ सकते हैं।
  3. कठिन ट्रैक: इसमें श्रीखंड़ महादेव, पिन-पार्वती पास आदि हैं।

आपकी 5 सबसे मुश्किल यात्रा कौन सी थी?

यह 5 का कोई महात्म्य है क्या? जहाँ एक भी बताना मुश्किल हो, वहाँ 5 बताने पड़ते हैं। चलिये, बताता हूँ:

  1. चादर ट्रैक, 2. साइकिल से लद्दाख यात्रा, 3. श्रीखंड़ महादेव, 4. एवरेस्ट क्षेत्र में चो-ला, 5. रूपकुंड़

दिल्ली से लद्दाख तक साइकिल यात्रा करने की हिम्मत कहां से आई. 

यह दिल्ली से लद्दाख नहीं, बल्कि मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा थी। असल में मैं कुछ अलग-सा करना चाहता था। तभी कहीं पढ़ा कि इस यात्रा को कोई भारतीय नहीं करता, विदेशी ही करते हैं। तभी सोच लिया था। साइकिल खरीदी, एक-दो छोटी-छोटी यात्राएँ कीं और जून 2013 में रास्ता खुलते ही निकल पड़ा।

आपने एक किताब भी लिखी है. उसके बारे में थोड़ा बताएं.

किताब है – लद्दाख में पैदल यात्राएँ। इसमें चादर ट्रैक और जांस्कर में शिंगो-ला ट्रैक का वृत्तांत है। शिंगो-ला पर सड़क बनाने का काम चल रहा है। कुछ वर्षों बाद सड़क बन जायेगी और फिर वहाँ ट्रैकिंग हमेशा के लिये बंद हो जायेगी। इसलिये अपने इस अनुभव को संजोने और आने वाली पीढ़ियों को दिखाने के लिये किताब का रूप दिया।

एक किताब फिलहाल प्रेस में है। यह एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित है।

एकांत पसंद लोगों को कहां घूमने जाने की सलाह देंगे?

ज़ाहिर है – भीड़भाड़ से दूर। प्रत्येक स्थान पर भीड़ का एक सीजन होता है। आप उस स्थान पर उस सीजन के अलावा कभी भी जाइये। जैसे उत्तराखंड़ में चारधाम है। वैसे तो कपाट मई से नवंबर तक खुले रहते हैं, लेकिन असली सीजन मई-जून ही होता है। आप जुलाई से नवंबर तक जाइये। आनंद आयेगा। और यमुनोत्री व गंगोत्री तो सर्दियों में भी जाया जा सकता है। केदारनाथ व बद्रीनाथ की तरह कोई रोकटोक नहीं है। एक बार मार्च या अप्रैल में यमुनोत्री जाईये और गर्म पानी के कुंड़ में बैठकर देखिये। यकीन मानिये, उस समय वहाँ केवल आप ही होंगे। अगर मोक्ष प्राप्त न हो जाये, तो कहना।

आपने नेपाल भी काफी घूमा है. वहां घूमना भारत में घूमने से कैसे अलग था?

नेपाल भारत से ज्यादा अलग नहीं है। हिंदी पूरे देश में बोली जाती है और भारतीय मुद्रा भी पूरे देश में स्वीकार की जाती है। खान-पान का ही थोड़ा-सा अंतर है, जो कि भारत में भी हर राज्य में अलग-अलग होता है।

कुछ दूसरे घुमक्करों के बारे में बताएं जो आपके मित्र है या जिन्हें आप फॉलो करते है. प्रेरणा लेते हैं.

इस बार आपने 5 के बारे में नहीं पूछा। शायद समझ गये होंगे। चलिये, मैं तीन घुमक्कड़ मित्रों के बारे में बताता हूँ:

  1. शंकर राजाराम: चेन्नई के रहने वाले हैं। शरीर से काफ़ी वृद्ध हैं, लेकिन मन से पूरे जवान हैं। बहुत सारे कठिन श्रेणी के ट्रैक भी कर चुके हैं। अविवाहित हैं और अभी भी देश घूमते रहते हैं। फेसबुक के माध्यम से हमारे संपर्क में रहते हैं।
  2. तरुण गोयल: हिमाचल के रहने वाले हैं। धौलाधार और पीर-पंजाल के मास्टर आदमी हैं। अपने ब्लॉग पर यात्रा-वृत्तांत लिखते हैं।
  3. ललित शर्मा: छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। पुरातत्वविद हैं। ज़मीन पर पड़े हुए मामूली पत्थर को देखकर बहुत-कुछ बता सकते हैं। और उस पत्थर पर यदि कोई कलाकृति हो या कुछ बना हो, तब तो किताब भी लिख सकते हैं। मुख्यतः फेसबुक के माध्यम से संपर्क में रहते हैं।

आपने भारत काफी घूम लिया है. विदेशों में घूमने जाने के लिए आगे कोई प्लान है क्या?

विदेश यात्रा के नाम पर केवल नेपाल भ्रमण ही है। भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और तिब्बत भी जाना चाहता हूँ। इसके अलावा किसी अन्य देश में जाने की इच्छा नहीं होती।

ट्रैवलिंग के वक्त कुछ बुरे अनुभव भी हुए होंगे. उसके बारे में बताएं. 

मैं बुरे अनुभवों को भूल जाना ही उचित समझता हूँ। लेकिन 2016 में मणिमहेश परिक्रमा के दौरान हमने अपने एक साथी को हमेशा के लिये खो दिया था, उसे कभी नहीं भूल सकता।

कभी ऐसा मन में आया कि अब आगे से नहीं घूमने जाऊंगा?

जब पत्नी से झगड़ा होता है, तब ऐसे ही विचार मन में आते हैं। लेकिन कुछ ही देर में हम फिर से बैठकर यात्राओं की योजनाएँ बनाने लगते हैं।

घूमना मेरा शौक है। साथ ही लिखना भी। थकान भी होती है, तो कुछ समय आराम कर लेता हूँ। उसके बाद फिर से काम पर लग जाता हूँ। इसे बंद करने का कभी विचार नहीं आया।

अब आपने शादी कर ली है और पत्नी के साथ घूमते हैं. तो इससे घूमने में या घूमने के तरीके में कुछ बदलाव आये हैं? क्या अब पहले से ज्यादा तैयारी करनी पड़ती है?

नहीं, बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। हम दोनों यात्राओं के दौरान एक जैसी मानसिकता के होते हैं। खाने में और ठहरने में वह ‘चूज़ी’ नहीं है। इसलिये तत्क्षण जो भी मिलता है, हम स्वीकार कर लेते हैं।

स्टूडेंट्स के लिए कोई मैसेज देना चाहेंगे?

मैसेज वैसे तो दे चुका हूँ। एक बार फिर से दोहरा दूँ – सबसे पहले आत्मनिर्भर बनो। अपनी घूमने की इच्छा या कुछ भी करने की इच्छा मिटने मत दो। अभिभावकों के पैसे से घूमने में वो स्वच्छंदता नहीं। और साथ ही अभिभावकों के लिये बता दूँ – बच्चों को कभी रोको मत। आपके बच्चे समझदार हैं। दुनिया देखने के बाद और ज्यादा समझदार होंगे।


THERE IS NO BIGGER TEACHER THAN TRAVEL: ARCHANA SINGH