प्रदीपिका सारस्वत एक युवा पत्रकार हैं. वर्तमान में फ्रीलांस राइटर हैं. इससे पहले उन्होंने द क्विंट और गाँव कनेक्शन के साथ काम किया है. acadman.in के साथ इस इंटरव्यू में प्रदीपिका ने अपने शुरुआती दिनों, सीरियस पत्रकारिता, कश्मीर में काम करने के अनुभव के अलावा कई अन्य दिलचस्प चीजों पर बात की है. 

कहां पैदा हुईं? कहां पली-बढ़ीं? शुरू के 15 साल कैसे गुजरे ?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के एक गाँव की मेरी पैदाइश है। शुरू के 9-10 साल यूपी के अलग अलग, क़स्बों और शहरों में गुज़रे। बचपन में पापा ने खिलौनों कि जगह इवान (रूसी लोककथाओं का मेरा पसंदीदा किरदार) और जोन ऑफ़ आर्क से दोस्ती कर दी। छठवीं क्लास से बोर्डिंग भेज दिया गया। वहाँ से इंडिपेंडेंट तरीक़े से सोचने और जीने की शुरुआती तरबिअत मिली। बारहवीं तक साइंस पढ़ी लेकिन तब भी कोर्स की किताबें कम उपन्यास और पत्रिकाएँ ज़्यादा पढ़ती थी, जिसकी वज़ह से घर से ख़ूब डाँट भी पड़ती थी। पर उस उम्र में इतना साफ़ हो गया था कि आगे जाके बस लिखना और पढ़ना है!

ऐसा लगता है कि आप सीरियस पत्रकारिता करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं. पत्रकारिता से इतना अधिक लगाव कैसे हुआ? 

पत्रकारिता से लगाव की बस एक वज़ह मैं ख़ुद को और आपको गिना सकती हूँ। जब आप अपने आस-पास के वातावरण को, लोगों को पढ़ने की कोशिश करते हैं और पाते हैं कि ये समाज किताबों में पढ़ाए जाने वाले समाज से काफ़ी पीछे है। ऐसे में क्या कर सकते हैं आप? या तो इन दोनों के बीच की खाई को भरने के लिए ख़ुद काम करने की कोशिश कर सकते हैं या फिर ख़ामियों की सामने लाकर उन लोगों पर काम करने का दबाव बना सकते हैं जो इस काम को करने के लिए नियुक्त किए गए हैं।

इसके अलावा भारत जैसे विविधता भरे देश में ऐसी तमाम चीज़ें हैं जिन्हें आप ख़ुद देखना, जानना चाहते हैं और अपने ज़रिए उन्हें भी दिखाना चाहते हैं जो ख़ुद अपने लिए ऐसा नहीं कर पाते। ऐसे में पत्रकारिता का रास्ता सबसे मुफ़ीद नज़र आता है।

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अगर आप सीरियस रिपोर्टिंग करना चाहें तो किन-किन तरह की चुनौतियां आपको महसूस हो रही है. विस्तार से बताएं. उन्हें आप कैसे डील करती हैं यह भी.

रिपोर्टिंग करना थोड़ा सा मुश्किल है हमारे समय में। विश्वविद्यालय से निकलकर जब आप एक मीडिया हाउस का हिस्सा बनते हैं तो आप जोश से भरे हुए होते हैं लेकिन शुरुआत में आपसे डेस्क पर रह कर सीखने की उम्मीद की जाती है। और अक्सर होता ये है कि एक बार डेस्क पर बैठने के बाद आप वहीं के होकर रह जाते हैं। लेकिन अगर आप वाक़ई रिपोर्टिंग करना चाहते हैं तो आपको अपने संस्थान को ये यक़ीन दिलाना होगा कि आप वाक़ई रिपोर्टिंग करना चाहते हैं। और इसके लिए आपको ख़ूब पढ़ना होगा, अपनी पसंद के इशू पर पकड़ बनानी होगी। रिपोर्टिंग आइडियाज़ शेयर करते रहना होगा। आपको कई बार अपने तयशुदा काम के घंटों से ज़्यादा काम करते हुए रिपोर्टिंग के लिए फ़ील्ड में जाना होगा, धूलभरी सड़कों और खटारा बसों में सफ़र के लिए तैयार रहना होगा।

पढ़ाई पूरी कर लेने के मैं बाद कॉर्परेट पत्रकारिता संस्थानों का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी। बहुत समझ भी नहीं थी कि मीडिया कैसे काम करता है। तो मैंने एक एनजीओ के साथ काम किया। लेकिन जव गाँव कनेक्शन अख़बार के बारे में पता चला तो लगा कि ये वो जगह है जहाँ मैं जा सकती हूँ। गाँव कनेक्शन ने मेरे भीतर के रिपोर्टर को खाद पानी दिया। वहाँ मैंने असल में सीखा कि पत्रकारिता क्या है। गाँव-गाँव जाना, लोगों से बात करना, समस्या को ग्रासरूट लेवल पर लोकेट करना सही मायने में पत्रकारिता है ना कि इंटर्नेट पर तलाश के स्टोरी आइडिया निकलना, ये मैंने वहीं सीखा। यहाँ तक कि एक ख़बर कैसे लिखी जानी चाहिए ये तक वहाँ सिखाया गया।

रिपोर्टिंग का सीधा सा मतलब है कि जो जैसा है उसे वैसा दिखाया जाए, समस्या के हर पहलू को टटोला जाए लेकिन अपनी तरफ़ से कुछ न जोड़ा जाए। रिपोर्टिंग में समस्या बाहरी से ज़्यादा भीतरी है। अगर आपने अपने विषय की तैयारी नहीं की है, आप सभी ज़रूरी सवाल नहीं पूछ सकते। और फिर शुरुआत में हम छोटी-मोटी ग़लतियाँ करते हैं, जैसे ठीक से नोट्स न लेना, फ़ोन नम्बर न लेना, नाम न पूछना, लेकिन धीरे-धीरे ये समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं।

कश्मीर से आपका क्या ताल्लुक है?

हाहाहा कश्मीर से मेरा ताल्लुक! बस यही कि बचपन से मेरे कुछ बहुत अच्छे दोस्त कश्मीरी रहे हैं। और अब मैं वहाँ एक रिपोर्टर के तौर पर जाती रहती हूँ।

कश्मीर पहली बार कब गईं? और पहला अनुभव और फीलिंग कैसी थी, क्या भारत के दूसरे शहर जैसा ही?

पहली बार कश्मीर गई थी मार्च 2016 में। स्कूल में कई कश्मीरी दोस्त बन गाए थे। तो कश्मीर जाने की ख़्वाहिश काफ़ी पुरानी थी। 2016 में जब तय किया कि अब नौकरी नहीं करनी, ट्रैवल करना है तो फिर एक बैकपैक लेकर जा पहुँची। मेरे लिए बहुत सरीअल था कश्मीर का पहला अनुभव। अप्रेल का आख़िरी हफ़्ता था। मैं देर रात पहुँची थी। वहाँ काफ़ी सर्दी थी। एक दोस्त के यहाँ ठहरने का इंतज़ाम था। मुझे तो लग रहा था जैसे मैं कोई सपना जी रही हूँ। सुबह 5 बजे ही आँख खुल गई। चिड़ियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। घर के बाक़ी लोग सो रहे थे और मैं खिड़की खोल कर इस तरह बाहर देख रही थी जैसे बाहर कोई दूसरी ही दुनिया हो।

यूँ तो कश्मीर भी देश के बाक़ी हिस्सों जैसा ही है, लेकिन यहाँ के लोग बहुत गर्मजोशी से मिलते हैं और यहाँ की मेहमान नवाज़ी की क़समें खाई जा सकती हैं।

Bobby Ghosh, Editor-in-Chief of HT: ‘Politicians, in Delhi & Srinagar, should do their job; Interns should be paid.’

कश्मीर से रिपोर्टिंग करने के कुछ अच्छे अनुभव के बारे में विस्तार से बताइए?

कश्मीर में ख़राब से ख़राब हालातों में भी रिपोर्टिंग करने में कभी दिक़्क़त नहीं आइ मुझे। इंडिपेंडेंट रिपोर्टर होने की वजह से मेरे पास अपनी गाड़ी वग़ैरह की सुविधा नहीं होती थी। लेकिन लोकल दोस्तों ने हमेशा आने-जाने में मदद की। मसलन जब बुरहान का एनकाउंटर हुआ तब घाटी के हालात बेहद ख़राब थे। त्राल की तरफ़ जाते हर रास्ते पर पुलिस, आर्मी और ग़ुस्साए कश्मीरी लड़कों के बीच पथराव और पैलेट्स चल रहे थे। लेकिन तब भी एक स्थानीय लड़के ने मुझे बुरहान के घर पहुँचने में मदद की, यहाँ तक कि देर रात लौटते वक़्त पुलिस पर पत्थर फेंकते लड़कों ने अपने घर पर रुकने का भी इसरार किया कि रात बहुत हो गई है आप यहीं रुक जाएँ।

और कोई मुश्किल आई हो? कुछ बुरा अनुभव हुआ हो?

जब घाटी में इंटर्नेट और मोबाइल सिग्नल्ज़ बंद कर दिए जाते थे तब काफ़ी परेशानी होती थी। बाहर शटडाउन होता था। कोई साइबर कैफ़े नहीं खुला होता था। ऐसे में स्टोरी फ़ाइल करने के लिए मैं राइज़िंग कश्मीर अख़बार के दफ़्तर जाती थी।

बुरा अनुभव जैसा तो कुछ नहीं, पर घाटी में लोग अब अजनबियों पर यक़ीन करने से कतराते हैं। कौन किस एजेन्सी के लिए काम कर रहा है ये किसी को नहीं पता होता। ऐसे में कई बार मुझे भी जज किया गया कि मेनलेंड इंडिया की ये लड़की घाटी में क्या करने आई है। शुरुआत में बुरा लगता था लेकिन बाद में इसकी आदत हो गई।

क्या आप अकेले कश्मीर गईं? 

हाँ मैं अकेले ही गई थी। अब भी जाती हूँ।

एक तो लड़की, ऊपर से बहुत अधिक अनुभव नहीं, ऊपर से कश्मीर? आखिर ये जुनून क्या है? किसी ने रोका नहीं? 

लड़की के अपने जुनून हो सकते हैं। मेरे भी हैं। कश्मीर किसे नहीं अट्रैक्ट करता। मैं पहली बार जब वहाँ गई तो तय नहीं किया था कि कितने दिन रहना है। पहली विज़िट में ही पाँच महीने वहाँ रह गई थी। जितना ज़्यादा वक़्त वहाँ बिताया उतना लगा कि अभी इस जगह को और समझना है, जानना है। किसी ने नहीं रोका। सर्दियों में ज़रूर पापा ने कहा था कि तुम्हें इतनी ठंड लगती है, वहाँ कैसे मैनेज कर पाती हो।

क्विंट में नौकरी कैसे मिली?

गाँव कनेक्शन में काम कर रही थी जब क्विंट के लिए अप्लाई किया था। एक न्यूज़ वीडीयो बनाने को कहा गया, फिर इंटर्व्यू और फिर जॉइनिंग।

क्विंट में आप रितू कपूर के साथ काम कर रही होंगी. उनके साथ काम करने, या मिलने का कोई खास अनुभव आप शेयर करना चाहें?

रितु काफ़ी पॉज़िटिव हैं। उतनी ही एनर्जेटिक भी। हमने एक रेप विक्टिम बच्ची की मदद के लिए कैम्पेन चलाया था। क्राउडफ़ंड भी कराया। ये रितु का ही आयडिआ था।

आपने कुल कितनी नौकरी की है. क्या क्विंट में काम करने का अनुभव अलग है?

एक पत्रकार के तौर पर मैंने सिर्फ़ गाँव कनेक्शन और क्विंट में ही काम किया है। पहली नौकरी ने जहाँ मुझे ग्राउंड रिपोर्टिंग की ज़रूरी ट्रेनिंग दी वहीं क्विंट ने मुझे डिजिटल मीडिया को समझने का मौक़ा दिया। क्विंट का वर्क कल्चर काफ़ी अच्छा है।

और बनारस से आपका ताल्लुक? 

बनारस मुझे बेहद पसंद है। मैंने मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई बीएचयू से की। उन्हीं दिनों इस शहर से प्यार हो गया। और एक बार जो इस शहर का हो जाता है फिर वो कहीं भी हो उसे लौट कर यहाँ आते रहना पड़ता है। मेरे साथ तो यही होता है। इन सवालों के जवाब देते वक़्त भी बनारस में ही हूँ।

प्रोफेशनल करिअर को अगर अलग करें तो बतौर एक वर्किंग वुमन आपकी जिंदगी में क्या चुनौतियां हैं? 

अभी तक तो एक वर्किंग वुमन की चुनौतियों को समझने का कोई मौक़ा नहीं मिला मुझे। फ़ुटलूज़ हूँ, सफ़र में रहती हूँ। जो ठीक लगता है करती हूँ।

घर में, ऑफिस में, या कहीं और आपका किसी भी तरह के हरैसमेंट से सामना हुआ हो?

घर की बड़ी बेटी होने के नाते मुझसे उम्मीदें थी कि 22 की होते-होते शादी कर के घर बसा लूँ। वहाँ मुझे अपनी लड़ाई लड़नी पड़ी। बाक़ी बाहर कभी ऐसी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।

क्या आपको कभी ये महसूस करना पड़ा कि आप लड़की हैं, समाज में दोहरे दर्जे की नागरिक? 

लड़की को अब भी बहुत बार दोयम दर्ज़े की नागरिक समझा जाता है। ख़ास तौर पर आपके अपने परिवार और समाज में। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। लेकिन मैंने कभी उसे सच नहीं माना। और आज मैं अपनी चुनी हुई ज़िंदगी जी रही हूँ। मेरी अपनी समस्याएँ हैं। पर समस्याएँ कहाँ नहीं होतीं।

अच्छा काम करने की प्रेरणा कहां से मिलती है?

ये प्रेरणा एक तो भीतर से मिलती है। आप ख़ुद को सबसे अच्छी तरह जज कर सकते हैं। और जब आप जानते हैं कि आप और बेहतर कर सकते हैं तो फिर आप किसी भी सूरत में रुकना नहीं चाहते। इसके अलावा आपके आस पास के लोग जो अच्छा काम कर रहे हैं, उनका काम भी आपको बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं।

आप आगे क्या-क्या करना चाहती हैं? यह सवाल बहुत सामान्य है, फिर भी पांच साल बाद की आपकी ख्वाहिशें क्या हैं?

बस ख़ूब काम करना चाहती हूँ। पूरा देश घूमना  है, अच्छे लेखकों को पढ़ना है और फिर ख़ूब लिखना है।

आपकी जिंदगी में प्यार-व्वार करने के लिए कितनी जगह है? क्या आप किसी से प्यार करती हैं ? (अगर आप बताना चाहें.) 

प्यार करने की जगह? प्यार हम सबकी बेसिक ज़रूरत है। फ़िलहाल मुझे अपने काम से प्यार है, परिवार और दोस्तों से प्यार है। (किसी को डेट नहीं कर रही हूँ 😉 )

लिखना आपका प्रोफेशन भी है, और ऐसा लगता है इसका ताल्लुक दिल से भी है. शौक भी है. क्या कोई अलग मौका आए तो आप बिना लिखे आप रह सकती हैं?

मुश्किल है। बिना लिखे उसी सूरत में रह सकती हूँ जब लिखना भूल जाऊँ।

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ईमानदार रहिए, अपने प्रति, अपने सपनों और कोशिशों के प्रति। चीज़ों को टालिए मत, बहाने मत बनाइए, आसान चीज़ें मत चुनिए और ख़ुद से झूठ मत बोलिए। बाक़ी सब उतना मुश्किल नहीं है। ख़ूब पढ़िए। बिना पढ़े अच्छा लिखना मुश्किल है।

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