सर्वप्रिय सांगवान वर्तमान में NDTV इंडिया में बतौर एडिटोरियल प्रोडूसर काम कर रही हैं. उन्होंने पहले डेंटल सर्जरी की पढाई की, फिर NDTV मीडिया संस्थान से डिप्लोमा लेकर NDTV में काम कर रहीं हैं. इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने शुरुआती पढाई, पत्रकारिता में कैसा आना हुआ, NDTV में नौकरी कैसे मिली और वहां काम करने के अनुभव के अलावा भी बहुत कुछ बताया है. आप उन्हें ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं @Sarvapriya


सर्वप्रिया, सबसे आप अपनी पढ़ाई के बारे में बताइए?

मैंने स्कूल की पढ़ाई रोहतक से की. करीब छः साल मैं वहां रही. उससे पहले मैंने अपना प्राइमरी एजुकेशन ज्योती प्रकाश नामक स्कूल से किया. यह सब बहुत ही सामान्य स्कूल थे. दसवीं में मुझे बायोलॉजी में बहुत इंटरेस्ट आने लगा था और मुझे मैथ्स नहीं पसंद था. इसलिए मैंने 11वीं – 12वीं में बायोलॉजी ले लिया. लेकिन उस समय भी मैंने यह नहीं सोचा था कि मुझे डॉक्टर बनना है. पर मेरे घरवालों को लगा कि मैंने बायोलॉजी लिया है तो डाक्टर ही बनूंगी. मैं जिस परिवेश से आती हूं वहां माता-पिता ही तय करते हैं कि आपको करना क्या है. मैंने एंट्रेंस एग्जाम दिए. एक में हो गया. तो फिर मैं ग्रेजुएट इन डेंटल सर्जरी हो गई.

आपका पत्रकारिता में कैसे आना हुआ?

ऐसा नहीं था कि मेरी पत्रकारिता में बहुत रुचि थी और मैं पत्रकार बनना चाहती थी. लेकिन मेरे पापा पत्रकार हैं. तो कहीं न कहीं आपकी सोच बचपन से ही वैसी बन जाती है, क्यूंकि आप बचपन से वहीं चीजें देख रहे होते हो. डेंटल सर्जरी की पढ़ाई पूरी होते ही पापा ने मुझे समझाया कि मुझे NDTV मीडिया इंस्टिट्यूट ज्वाइन करना चाहिए. फिर मैंने उसे ज्वाइन लिया. मेरा पत्रकारिता करने का कोई इरादा नहीं था. मैं वहां बस कुछ नया सीखने गई थी. पर जब मैं वहां सीखने लगी तो काफी सीरियस हो गई. मुझे धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. फिर मैंने तय किया कि इसे जारी रखूंगी. और बहुत शुरुआत में ही मुझे रविश कुमार का साथ मिल गया. उनके साथ ही मैं काम कर रही थी. उनको मैं NDTV में आने से पहले नहीं जानती थी. उनके साथ रह-रह कर ही मैंने उन्हें जाना है और उनसे सीखा है. तो जब आपको हिन्दी के सबसे बेस्ट पत्रकार का साथ मिल जाता है तो स्वाभाविक रूप से आप वापस नहीं जाना चाहते हो. आप उसी फील्ड में आगे अच्छा करना चाहते हो.

NDTV मीडिया इंस्टिट्यूट में आपका अनुभव कैसा रहा?

NDTV मीडिया इंस्टिट्यूट ने मेरी पूरी री-स्कूलिंग की है. मुझे ऐसा लगता है कि जब मैं यहां आई थी तो मैं अपने साथ वह सारी चीजे लाई थी जो हम अपने स्कूल-कॉलेज में सीखते हैं. वह सारी चीजे पूरी राइट विंग होती है. वहां पर बहुत चीजे आपको ऐसी सीखाई जाती है कि आपको अपने टीचर को क्वेश्चन नहीं करना है. अपने माता-पिता पर सवाल नहीं करना है. फांसी की सजा में कुछ गलत नहीं है. आपके अन्दर “राष्ट्रवाद” भरा जाता है.

जब मैं NDTVMI में आई, मैं ऐसी चीजों पर बहुत सोचती थी. धीरे-धीरे मैं अपने सीनियरों से बातें करने लगीं और मुझे लगने लगा कि जो मैं  इन चीजों के बारे में सोचती थी, वह सही है. मुझे ऐसा लगता था कि एक लोकतंत्र में आंख के बदले आंख और जान के बदले जान लेना सही नहीं है. और फांसी देने से कोई न्याय नहीं मिलता. तो मैंने वहां और भी बहुत सारी चीजें सीखीं.

जैसे-जैसे आप चीजें जानते हो, सीखते हो, समझते हो, बात करना शुरू करते हो, तो आप में एक अलग कॉन्फिडेंस आ जाता है. तो मुझे लगता है कि NDTVMI ने मुझे बहुत चेंज कर दिया. मेरी पूरी लाइफ बदल दी. पूरा नजरिया बदल दिया.

आपको NDTV इंडिया में नौकरी कैसे मिली? आपके हिसाब से किन वजहों के कारण आपका चयन हुआ?

NDTV का जो मीडिया इंस्टिट्यूट है उससे हर साल कई प्लेसमेंट होते हैं. मैंने जब वहां ज्वाइन किया तो कोई जगह खाली थी, और मैंने छः महीने वहां इंटर्नशिप की थी. उसका परफॉरमेंस भी शायद अच्छा था. मैं किसी काम के लिए मना नहीं करती थी. अन्दर से एक ललक होती है कि आपको छोटा काम मिला हो या बड़ा, आप दोनों को अच्छे तरीके  से करते हो. शायद NDTV में यहीं चीज देखी जाती है. कई जगह पर यह नहीं देखते पर NDTV में इसको जरूर नोटिस करते हैं.

नौकरी मिलने में परीक्षा के नंबर कितना असर डालते हैं? नौकरी पाने के लिए और किन किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?

जब प्लेसमेंट होता है तो मार्क्स से से ज्यादा आपके व्यक्तित्व को ध्यान में रखा जाता है. आपकी बोल-चाल कैसी है. नॉलेज कितनी है. मार्क्स से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. आपकी नॉलेज अच्छी होनी चाहिए. आपके करंट अफेयर्स सही होने चाहिए. अगर आपका सोशल साइंस या इकोनॉमिक्स या किसी भी सब्जेक्ट में अच्छी पकड़ है, तो आपके लिए जर्नलिज्म में अच्छा स्कोप है.

आप NDTV में अपनी जिम्मेदारियों के बारे में बताइए?

शुरुआत से ही मैं प्राइम टाइम शो, जिसके एंकर रविश कुमार हैं, के लिए रिसर्च का कम कर रही हूं. हमलोग जब प्राइम टाइम पर बहस के लिए कोई विषय चुनते है तो मेरा काम है उसपर पूरा रिसर्च करना. उसके हर बारीकियों को ध्यान में रखना. चीजों को सरल बनाना की एक आम आदमी भी उसे समझ पाए. कभी-कभी एंकर कुछ चीजें मिस कर देता है. तो यह एडिटोरियल प्रोडूसर का काम है कि एंकर को वह बताये.

मैंने रविश कुमार के साथ असेंबली चुनाव के दौरान रिपोर्टिंग भी की है. पहले मैं रिसर्चर थी लेकिन अब मेरा पोस्ट एडिटोरियल प्रोडूसर हो गया है. लेकिन मेरा काम वहीं है. साथ ही साथ मैं न्यूज एंकर भी हूं.

क्या आप रविश कुमार के साथ अपना कोई अनुभव साझा करना चाहेंगी?

बहुत सारी चीज मैंने उनके अन्दर देखी है, सीखी है. अगर मैं किसी और के साथ काम करती तो शायद नहीं सीख पाती. मुझे उनकी एक बात बहुत अच्छी लगी, भाषा को लेकर. जब हम एक शो कर रहे थे तो मैं उनको बता रही थी की ऐसा-ऐसा एक लॉ में लिखा है. उसमें  ऐसा था कि जो सिंगल और विधवा हैं, वो लोग भी अडॉप्ट कर सकते हैं. मैंने उनसे बोला कि विधवा भी कर सकती हैं. तो उन्होंने बोला कि – यह शब्द मैं इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्यूंकि जब भी मैं इस शब्द से गुजरता हूं, इस से जुड़ी समाज की कुरीतियां मेरे दिमाग में आ जाती हैं. यह चीज मुझे काफी टच कर गई थी. मुझे यह एहसास हुआ कि जिस तरह का इन्सान रविश खुद को दिखाते हैं, अंदर से भी वो वैसे ही हैं.

पहले आपने डेंटल सर्जरी की पढाई की. फिर आपने पत्रकारिता में डिप्लोमा किया. और अभी आप लॉ पढ़ रही हैं? आपको लॉ पढ़ने की जरूरत महसूस हुई या यह कोई जुनून है?

दो चीजे हैं. एक तो बचपन से मुझे लॉ में थोड़ा इंटरेस्ट था. दूसरा यह है कि अगर आपको जर्नलिज्म करना है तो आपको बहुत सारी फील्ड की जानकारी होनी चाहिए. अभी जिन एंकरों को आप देखते है, उनका नॉलेज बहुत कम है. उनको शायद यह भी नहीं पता है कि गैर जमानती अपराधों में भी आगे चल कर जमानत मिल सकती है. अंतरिम जमानत के बारे में नहीं पता उनको. तो बहुत सारी ऐसी रोजमर्रा की चीजें हैं जो उनको नहीं पता होती, और जो लोग एक एंकर को देखते हैं, वो ऐसा सोचते है कि एंकर उनसे बहुत ज्यादा ज्ञानी है. इसलिए हर एंकर को ज्यादा से ज्यादा चीजें पता होनी चाहिए. जर्नालिस्ट को हमेशा पढ़ते ही रहना चाहिए.

जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

अगर कोई ग्लैमर को देख कर आ रहा है तो 50% उसका चांस है. लेकिन अगर कोई सही मायने में पत्रकारिता करने आ रहे हैं तो आपको 10% चांस है. क्यूंकि इस पेशे को एथिक्स के साथ लेकर चलना बहुत मुश्किल है. जहां तक स्किल की बात है, चाहे हिन्दी हो या इंग्लिश, भाषा पर पकड़ होनी चाहिए. सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि आप रोज अखबार पढ़ें. अगर आप न्यूज चैनल देख रहे हैं तो आप उस एक जगह पर ही रह जायेंगे. आप बहुत बॉक्स्ड रह जायेंगे. आपको नहीं पता चलेगा कि चैनल की स्टोरीज बहुत कम होती है और उनमें डेप्थ नहीं होता. लेकिन अखबार से आपको ज्यादा गहराई में जानकारी मिलेगी.

हिन्दी पत्रकारों को अंग्रेजी वालों की तुलना में बहुत कम पैसे मिलते हैं. इसपर आपकी क्या राय है?

हां, यह बात तो है. जब मैं हिन्दी जर्नलिज्म में आई तो लोगों ने बोला कि इंग्लिश में स्विच हो जाओ, हिन्दी में पैसे नहीं है. लेकिन कभी मुझे इस बात की वजह पता नहीं चल पाई. क्यूंकि हिन्दी की ऑडियंस भी ज्यादा है. पर तब भी पता नहीं पैसों में इतना अंतर क्यूं है?

उन स्टूडेंट्स के लिए आपका मेसेज जो आपकी जगह पर आना चाहते हैं?

एक मिक्सचर है. कुछ आपके किस्मत की बात होती है, कुछ आपके अन्दर की बात होती है. मुझे नहीं लगता कि मैं सफल पत्रकार हूं. मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि अपने आप को बॉक्स्ड ना करो, किसी भी तरीके से. अपने आपको बौद्धिक रूप से निखारते रहो. अगर आप में यह चीजें रहेंगी कि आपको और जानना है और सीखना है तो आप जरूर सफल होंगे. एक पत्रकार के रूप में अगर आप अपने ऑडियंस को इफेक्ट कर सकते हैं, तो आप सफल हैं. रविश कुमार सफल हैं.


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