Saurabh Dwivedi is the editor of The Lallantop, a Hindi 2.0 website. In his career spanning nearly a decade, he has worked with Star News, Navbharat Times, Dainik Bhaskar and India Today Digital. You can follow him on twitter at @saurabhtop


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आपको पत्रकारिता में आने के लिए किस चीज ने प्रेरित किया?

हिंदी में पढ़ाई लिखाई करता था. बहुत सही लगती थी पत्रकारों की लाइफ. टीवी पर आ रहे हैं, लिख रहे हैं. जो देश में सबसे ताकतवर लोग माने जाते हैं वो हैं राजनेता और नौकरशाह. तो पत्रकार उनके ऊपर भी लिखते थे और बहुत कठोर हो कर लिखते थे. उनकी भी आलोचना करते थे. तो मुझे लगता था यह बहुत ही पावरफुल और जिम्मेदारी वाला काम है.

आप सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे हैं. लोगों की दिक्कतें सरकार के सामने ला रहे हैं. तो उस टाइम तो यह था दिमाग में. फिर जैसे-जैसे और पढ़ते गए तो समझ में आता गया की यह उस से भी ज्यादा जिम्मेदारी का काम है. क्यूंकि आप एक तरह से अपने समय का इतिहास दर्ज करते हो और यहां तक की उसे आकार भी देते हो. मीडिया कुछ मुद्दों को उठाता है, वो बहुत बड़े हो जाते हैं. कुछ को इग्नोर कर देता है, वो बड़े नहीं हो पाते. भाषण देता था. भाषा पर पकड़ थी. पॉलिटिकल रीडिंग में बहुत दिलचस्पी थी. इन सब वजहों से मीडिया में इंटरेस्ट आया.

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अपने एजुकेशन के बारे में थोड़ा बताएं.

मैंने अपनी बिलकुल पहली पढ़ाई गांव में की. उसके बाद उरई आ गया. उसके बाद कानपुर के बोर्डिंग में पढ़ाई की. उरई से ही मैथ्स में ग्रेजुएशन किया. फिर JNU आ गया. हिंदी साहित्य में मास्टर्स की. उसके बाद IIMC से पत्रकारिता की पढ़ाई की. फिर JNU से MPhil किया.

आपने सबसे पहले काम कहां से शुरू किया?

सबसे पहले मैं स्टार न्यूज में गया था. जो अब ABP न्यूज कहलाता है. वहां मैंने दो महीने इंटर्नशिप की थी. क्रिकेट वर्ल्ड कप चल रहा था. पर मैंने क्रिकेट पर रिपोर्टिंग नहीं की. मैं वहां रेगुलर न्यूज वगैरह किया करता था. वहां प्रोग्राम होते थे 24 घंटे 24 रिपोर्टर टाइप के. फिर एक Astro शो शुरू हुआ था. मैं उसमें इंटर्न करने लगा..

आपने टाइम्स और भास्कर समूह में करीब तीन-तीन साल काम किया है. क्या आप वहां काम करने के वातावरण और संस्कृति की तुलना करना चाहेंगे? वहां का अनुभव कैसा रहा?

टाइम्स समूह काफी स्ट्रक्चर्ड है. वहां पर आपका शोषण नहीं हो सकता. हिन्दी मीडियम के लोगों में एक आम राय होती है कि बहुत ही अलग कल्चर होता है. जहां पर आप संपादक के पैर छूते हैं. उस तरीके की चीजें टाइम्स ग्रुप में कतई नहीं होती. लेकिन अगर आप बहुत महत्वाकांक्षी हैं और बहुत जल्दी ग्रो करना चाहते हैं, तो थोड़ा मुश्किल है.

लेकिन यह एक अच्छा ट्रेनिंग ग्राउंड था. नवभारत टाइम्स में मैंने पत्रकारिता की कुछ बहुत जरूरी चीजें सीखी. भास्कर में क्या है कि अगर आप अच्छा काम कर रहे हैं और अगर आपके एडिटर को लग रहा है कि आप अच्छा काम कर रहे हैं, तो आपको खूब मौके मिलते हैं. पर इसका उल्टा भी है. कई बार आप बहुत मेहनत कर रहे हैं लेकिन अपने एडिटर या टॉप बॉस की नजर पर नहीं चढ़ते हैं, तो सारी मेहनत बेकार चली जाती है.

नवभारत में मैंने बेसिक सीखी है और भास्कर ने मुझे बहुत सारा एक्स्पोजर दिया है. मैं सिर्फ 26-27 साल का था जब मैं न्यूज राइटर बना. नए सप्लीमेंट लॉन्च करना बिलकुल स्टार्ट से. उसकी डिजाइन, उनमें क्या कंटेंट होगा. ये सारे अनुभव बहुत काम आए.

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Saurabh with the Lallantop Team

आज भारत में हिंदी पत्रकारिता की क्या स्थिति है?

अच्छी स्थिति है. हिन्दी में टाइप करना बहुत आसान हो गया है. गूगल इनपुट से कोई भी टाइप कर सकता है. हर आदमी अपने आप को अभिव्यक्त कर रहा है. जब इतने सारे लोग हिन्दी में अपने आपको अभिव्यक्त कर रहे हैं, तो मार्केट इन सबको मान्यता दे रहा है. जब मार्केट ग्राहक को मान्यता दे रहा है, तो वो ग्राहक की जरूरतों को भी मान्यता दे रहा है. जब इतने सारे लोग हिन्दी बोल रहे हैं, तो हिन्दी बोलने वाली लॉबी बहुत पावरफुल हो गई है मार्केट में. इसीलिए बड़ी-बड़ी कम्पनियां हिन्दी की वेबसाइट में निवेश कर रही हैं.

लेकिन उसमें यह भी देखना पड़ेगा कि हिंदी का जो कंटेंट आ रहा है, वो क्या नए क्राउड का प्रतिनिधित्व करता है? या उनकी जरूरतों को पूरा करता है? ज्यादातर मामलों में मुझे ऐसा नहीं लगता. या तो बहुत ही सनसनीखेज सेमी-पोर्न किस्म की खबरें दिखाई जाती हैं. (Youtube ट्रेंडिंग में आपको इस तरह के बहुत विडियो मिल जायेंगे.) या फिर बहुत ही पुराने ढर्रे पर… उस चक्कर में बहुत ही हवा-हवाई भाषा का प्रयोग करने वाली बहुत सारी मीडिया है. तो अभी यह एक चैलेंज है. आप को अच्छा कंटेंट भी देना है और आर्थिक रूप से सफल भी होना है. आपको अपनी जगह भी बनानी है. लल्लनटॉप वहीं करने की कोशिश कर रहा है.

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एक कंटेंट वेबसाइट को सफल बनाने के लिए किन चीजों की जरूरत पड़ती है?

सबसे पहले आपकी नियत होनी चाहिए. अगर आपकी नियत कुछ सार्थक करने की है, कुछ रेलेवेंट करने की है, सही दखल देने की है, तो फिर चीजें ठीक होंगी. बशर्ते आप उसको स्मार्टली करें. उसके अलावा हमलोग जिसे “आउट ऑफ़ द थिंकिंग” कहते हैं, उस पर ध्यान देना चाहिए. पर सच्चाई यह है कि ज्यादातर लोग एक दिए गए पैरामीटर्स और स्ट्रक्चर में ही हाथ-पैर मारने की कोशिश करते हैं. लल्लनटॉप के सफल होने की एक बड़ी वजह यह है कि इसमें पत्रकार बहुत कम हैं. लल्लनटॉप पत्रकारों की तरह नहीं सोचता. हमारी टीम की ताकत वह लोग हैं जो जर्नलिज्म के बैकग्राउंड से नहीं आये हैं. जिन्होंने उसकी पढ़ाई नहीं की है. लेकिन वो स्मार्ट और क्रिएटिव हैं. उनके पास पत्रकारिता का हैंगओवर नहीं है.

रीडर्स से कुछ छिपाना नहीं चाहिए. आजकल के रीडर्स बहुत स्मार्ट हैं. आप उनको बेवकूफ नहीं बना सकते. आपकी ब्रेन फिलोसफी बहुत स्पष्ट होनी चाहिए कि आप किस ऑडियंस को कैटर करना चाहते हो. आप एक ही दुकान में चाइनीज भी रख लो, साउथ इंडियन भी रख लो, वो नहीं चलेगा अभी. लल्लनटॉप में हमने बहुत स्पष्ट रखा था कि हम जो मिलेनिअल क्राउड है, जो अच्छी चीजें जानना चाहता है हिन्दी की, उनको कैटर करेंगे. जो लोग काम कर रहे हैं उनमें एक बाइंडिंग फ़ोर्स भी होती है. वे लल्लनटॉप के आईडिया में यकीन करते हैं, जो बहुत जरूरी है. क्यूंकि जो लोग काम कर रहे हैं अगर वह यकीन नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

एक आखिरी और सबसे जरूरी चीज है कंटेंट. अगर आप इन्टरनेट पर उपलब्ध चीजों को कट-कॉपी-पेस्ट करके डालेंगे तो आप ज्यादा दिन चलेंगे नहीं. अगर चल भी जायेंगे तो आपकी ब्रांड इमेज नहीं बनेगी. तो कंटेंट के लिए आपको बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, फील्ड में जाना पड़ेगा, किताबें पढ़नी पड़ेगी, सिनेमा देखना पड़ेगा.

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कब लगा कि लल्लनटॉप सफल हो गई?

जब आपको कोई मेल करता है, फीडबैक देता है कि आप बहुत अच्छा कर रहे हैं. अगर लोग ऐसा बोलते हैं कि हम सिर्फ आपको देखते है और मीडिया देखना बंद कर दिया है. तो आपको लगता है कि आप सफल हो रहे हैं. कई बार जब लोग आप पर हमला करते हैं, सार्वजनिक प्लेसेस पर, तब आपको लगता है कि आप सफल हो रहे है. तभी आपको नोटिस किया जा रहा है. हमने चुनाव की कवरेज की. लोगों को लगा कि इस तरीके से भी जर्नलिज्म हो सकती है. फीडबैक मिला. मेल आते रहे. तब लगता है कि चीजें सफल हो गईं.

पर यह जो सफलता है बहुत दिमाग खराब करने वाली चीज है. हम सफलता के बारे में सोचने के बजाय अगली चुनौती के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं. क्यूंकि ये बहुत कंटीन्यूअस प्रोसेस है. अगर आप सफल हो गए तो लोग कहेंगे कि धक्के में सफल हो गए. और अगर बहुत अधिक सफल हो गए तो लोग कहेंगे आप फार्मूला वक्त हो गए. और इससे भी ज्यादा सफल हुए तो लोग कहेंगे कि आप कुछ नया नहीं कर रहें हैं, क्यूंकि आपने सफलता का फार्मूला पा लिया. तो आपको लगातार चलते रहना होगा. ऋगवेद का एक श्लोक है – “चरै रीती चरै रीति” – चलते रहो चलते रहो. तो वहीं हमलोगों में है. बाकी एक शेर है जो हमने अपनी दीवार पे लगा रखा है –

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां,
हो रहेगा कुछ  कुछ घबराएं क्या

हमलोग कोई बहुत बड़ी हस्ती तो हैं नहीं. हजारों लड़ाकू सिकंदर और चंगेज आ कर चले गएं. दुनिया चल रही है. तो हम किसी गलतफहमी में नहीं रहते हैं कि हम बहुत इधर से उधर चीजें कर देंगे. बस हमारा काम है. हमारा पैशन है. उसको किये जा रहे हैं.

काम करते वक्त किस तरह की चुनौतियां सामने आई. उस पर बात करना चाहेंगे?

दिक्कत तो किसी भी काम में आती ही है. आप उस पर बात करते हैं तो फिर वही होता है कि आप बता रहे हैं कि आप कितने महान हैं. आपने इतनी चुनौतियों से पार पा ली. पब्लिक में एक किस्म का दोगलापन है. तो पब्लिक अपने whatsapp विडियो में हो सकता है अश्लील मैसेज भी देखें. नेताओं की खिल्ली उड़ाते हुए वीडियो भी देखे. लेकिन जब वो पब्लिक डोमेन में आता है तो वो बड़े सत्यवान का और बहुत ही सतीत वाला रूप धारण कर लेते हैं. खुद बैठ कर लड़कियों पर खिल्ली वाले जोक सुनाएंगे और अगर कोई पॉलिटिशियन या कोई फिल्म स्टार घिरेगा तो उसको बिल्कुल कंगारू कोर्ट बिठा कर फतवा जारी कर देंगे. तो यह सभी समाज की दिक्कतें हमेशा से रही हैं.

एक यह चीज है, जैसे मान लीजिये हम बात-चित में पेशाब शब्द का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन मीडिया में बोला जाता है – मूत्र. अब हमने कहीं लिख दिया कि वह पेशाब कर रहे थे. तो लोगों ने बोला कि साहब यह आपकी क्या भाषा है? या कहीं कोई गाली आ गई तो लोग कहते हैं कि साहब आप गाली लिख रहे हैं.

तो यह अश्लील और बोल्ड का जो पूरा बहस है, यह हजारों साल से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा. कई बार ऐसा होता है कि लोग धारणा बना लेते हैं हमारे बारे में. हमलोग जब अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की बात करते हैं, तो लोगों को लगता है कि मुसलमान इस वेबसाइट को चला रहा है. हमलोग जब मोदी या केजरीवाल की आलोचना करते हैं, तो लोगों को लगता है कोई कांग्रेसी इसे चला रहा है. तो दरअसल जो इल्जाम लगाते हैं, वो उससे अपनी सोच को रिफ्लेक्ट करते हैं. क्यूंकि हमलोग तो इस तरह से सोचते नहीं हैं. हमारा तो बहुत साफ अन्तरात्मा है. कोई हमारा ऐसा एजेंडा नहीं है. तो इस तरह की चुनौतियां आती हैं. लेकिन अब हमें पता हो गया है कि अपना काम कैसे करना है. क्यूंकि अगर हम इल्जामों पर रुक के जवाब देने लगेंगे तो हमारा काम प्रभावित होगा.

दूसरी चीज हमने यह सीखी कि कहीं कोई गलती है तो उसको मान लो और आगे बढ़ो. क्यूंकि गलतियां तो सबसे होती हैं. गलतियों पर अड़े रहना और भी बड़ी गलती होती है.

डिजिटल पत्रकार बनने की चाह रखने वालों को किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए?

सबसे पहले तो भाषा. अगर आपकी उंगलियां नहीं हैं, तो आप ना हथियार चला पाओगे ना ही पेंटिंग बना पाओगे. तो भाषा आपके हथियार के जैसे होती है. आपकी फिटनेस होती है. भाषा को लेकर ही लोग काफी गलतियां करते हैं. मात्रा की गलतियां होती हैं. तो फिर पहली चीज है भाषा और दूसरी चीज है लोग मेहनत नहीं करते. पढ़ाई-लिखाई नहीं करते. हवा-हवाई टाईप के हो गए हैं. टीवी डिबेट टाइप के लोग. जिनको आप एक घंटा सुन लो फिर भी आपको मतलब नहीं समझ आएगा. जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स भी वैसे ही हो गए हैं. वह बहुत ही जोश में आएंगे कि उन्हें पॉलिटिक्स में इंटरेस्ट है और कभी भी गहराई में पढ़ाई नहीं की होगी. तीसरी चीज है – सब चीजों को थोड़ा-थोड़ा जानिए और किसी एक चीज को अच्छे से जानिए. मास्टर ऑफ वन, जैक ऑफ ऑल. वह एक चीज आपको बहुत अच्छे से आनी चाहिए

डिजिटल पत्रकारिता के फायदे और नुकसान क्या हैं?

फायदे तो बहुत सारे हैं. कोई गलती होती है तो आप ठीक कर लेते हो. लेटेस्ट टेक्नोलॉजी को आप इस्तेमाल कर सकते हो. आप सीधे पहुंच रहे हो लोगों के पास. मैंने स्टोरी लगाई और लोग पढ़ रहे हैं. हम हॉकर पर निर्भर नहीं हैं. हम ब्रॉडकास्टर पर निर्भर नहीं है.

नुकसान यह है कि प्रोपेगेंडा बहुत फैल गया है. एक फर्जी मैसेज चलता है, उसको कई लोग whatsapp करते हैं. whatsapp जर्नलिज्म बहुत फैल गया है. फर्जी चीजें whatsapp पर फॉरवर्ड की जा रही हैं और फिर उन्हीं को न्यूज का रूप दे दिया जा रहा है. लोग जल्दी के चक्कर में क्रॉस-चेक नहीं करना चाहते. जल्दी के चक्कर में विश्वसनीयता खतरे में आ गई है.

ऐसा कहा जाता है कि पत्रकारिता अब इंफोटेनमेंट हो गई है. इसपे आप क्या राय रखते हैं?

यह 5-10 साल पुरानी थ्योरी हो गई है. जर्नलिज्म को अगर एंटरटेनमेंट की तरफ से देखो तो हर तरह की जर्नलिज्म उपलब्ध है. तो एक ही नपनों से हर तरह की चीजें नहीं नापनी चाहिए. एंटरटेनमेंट भी उपलब्ध है. पहले भी उपलब्ध था. पहले मायापुरी पढ़ने वालों को बुरा माना जाता था. अब वो लोग खुल के पढ़ रहे हैं. तो एंटरटेनमेंट भी उपलब्ध है और सीरियस जर्नलिज्म भी उपलब्ध है. आदमी अपने हिसाब से कंटेंट सेलेक्ट कर लेता है. हर तरह के ग्राहक के लिए चीजें उपलब्ध हैं. बहुत सीरियस चीजें आपको पढ़नी है तो वो भी है. हल्की-फुल्की पढ़नी है तो वो भी है.

पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारिता की डिग्री की कितनी आवश्यकता हैअगर कोई सोशियोलॉजी का छात्र पत्रकार बनना चाहे तो क्या मुश्किलें है?

मुझे नहीं लगता कोई आवश्यकता है. सोशियोलॉजी का छात्र ज्यादा अच्छा पत्रकार बन सकता है. पत्रकारिता की पढ़ाई खराब कर देती है लोगों को. आपको एक खास ढांचे में सोचने को प्रेरित कर देती है. आपको कुछ फॉर्मूले सिखा देती है. आपको मैं यह लल्लनटॉप का वर्जन बता रहा हूं. जब कोई नए बैकग्राउंड से आता है, जैसे किसी ने MBBS किया है, इंजीनियरिंग किया है या फिर सोशल साइंस पढ़ कर आया है, तो वो एक नया नजरिया लाता है. नई जबान के साथ आता है. और यह नई जबान, नया एंगल, हिंदी जर्नालिज्म के जिन्दा रहने के लिए बहुत जरुरी है. पत्रकारिता की पढ़ाई से कुछ नया एंगल नहीं मिल पाता है.

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की स्थिति काफी बुरी है. इसके क्या कारण हैं और इसे सुधारने के लिए क्या किया जा सकता है?

बहुत सारे स्टेकहोल्डर हैं इस प्रॉब्लम के. सरकार है, लोग हैं, और उन्हीं के बीच में कहीं जर्नलिस्ट हैं. यह किसी एक के करने की चीज नहीं है. लोगों को यह भी ध्यान रखना पड़ेगा. ऐसे मीडिया को बढ़ने का मौका मिलना चाहिए जो विश्वसनीय हो. सबको एक दूसरे से ताकत मिलती है. अब मान लीजिये कल कोई जर्नलिस्ट किसी भ्रष्ट राजनेता या सरकार के बारे में लिखता है, जो लोगों के हित के लिए है, तो उसके पक्ष में लोग नहीं उतरेंगे सड़कों पर. जब लोग नहीं उतरेंगे तो राजनेता को लगेगा कि वह पत्रकार को क्रश कर सकते हैं. दबा सकते है. क्यूंकि उसके पास पब्लिक सपोर्ट नहीं है. राजनेता पब्लिक से डरते हैं. जब राजनेता को परवाह नहीं है, लोगों को परवाह नहीं है, तो फिर मीडिया कंपनियां पीछे हट जाती हैं. तो सब कुछ बहुत घाल-मेल हो रखा है. किसी एक से नहीं है. बाकी इंडिपेंडेंट लोग काम कर ही रहे हैं. डिजिटल मीडिया के आने से एक सहूलियत हो गई है. अगर आपके पास किसी के खिलाफ सबूत है और कोई स्थापित मीडिया उसको नहीं छाप रहा है, तो आप उसे खुद ही छाप सकते हो. अब तो हर कोई पब्लिशर है. JULIAN ASSANGE इसका बहुत बड़ा उदहारण है.

यह भी कहा जाता है कि मीडिया लोगों के हिसाब से खबरें दिखाता है और जरूरी चीजों को दरकिनार कर देता है. आप इसे कैसे देखते हैं?

डिपेंड करता है. मीडिया हाउस पर भी और एडिटर पर भी. यहां बहुत घाल-मेल है. कई बार होता है कि कई महत्त्वपूर्ण खबरें नहीं दिखाई जाती हैं. टीवी में खासतौर पर. एक खबर अगर चल रही होती है तो उसी को चलाते रहते हैं. कई लोग होते हैं जो ज्यूडिशियल ब्लेंड रखते हैं. यह मेरे ख्याल से चैनल के ऊपर निर्भर करता है. आप किस तरह की चीजें दिखाना चाहते हैं. अब तो कई लोग टीवी देखते ही नहीं हैं. ग्राहक भी अपनी मर्जी के हिसाब से खुद को ढाल लेता है.

यह सब दिक्कतें हैं. क्या किया जाए इसका? कुछ है जो किसी एक पार्टी के बंधुवा मजदूर की तरह कुछ मुद्दों को छोड़ देते हैं, कुछ मुद्दों को उठा देते हैं. पर जनता का एक बड़ा तबका है जो इस तरह के फर्जीवारे को समझता है और सराहता नहीं है. आप पब्लिक को मूर्ख नहीं बना सकते. मैं बार-बार कहता हूं कि पत्रकारिता सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ शाश्वत प्रतिपक्ष की तरह होती है. पत्रकारिता का काम राजसत्ता का चेरी बनकर उसकी तारीफ करना नहीं है. पत्रकारिता उस खड़ाऊ की तरह होनी चाहिए जो एक संयासी के पैरों में होती है. जब वो राज-प्रसार में घुसे तो उसकी धनक से सिंहासन हिलने लगे. इसे ज्ञान की तरह रखिये. और वो ज्ञान तभी हो सकता है जब आपको सत्ता का मोह ना हो. जब आपको सत्य कहने में किसी तरीके की दिक्कत ना हो. किसी किस्म का लोभ ना हो.

लल्लनटॉप को पांच साल बाद आप कहां देखते हैं?

देश का सबसे ज्यादा भरोसेमंद और नौजवान ब्रांड. जिसके साथ गलत हो रहा है उसकी आवाज बने. कुछ अच्छा हो रहा है तो उसकी आवाज बने. नौजवानों को सही गलत का फर्क भी समझाएं. यह जरूरी नहीं कि हर वह चीज जो बताई जा रही हो वो सही हो. तो मैं चाहता हूं कि लल्लनटॉप देश की वो आवाज बने, जो सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखे.

पत्रकार बनने की चाह रखने वालों के लिए आपके महत्वपूर्ण सुझाव?

मेहनत कीजिये. महत्वाकांक्षाओं का होना अच्छा है लेकिन उसे पूरा करने के लिए मेहनत कीजिये. किसी के फैन मत बनिए. फैन बनके आप अंधे हो जाते हैं. मेहनत का कोई विकल्प नहीं है.


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