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सुशांत सिन्हा हिन्दी के एक जाने-माने पत्रकार है. वर्तमान में वह इंडिया न्यूज़ में बतौर सीनियर एंकर / डिप्टी एडिटर काम कर रहें हैं. इस से पहले उन्होंने NDTV, न्यूज़ 24 के आलावा कई अन्य मीडिया घरों में काम किया है.

Acadman के साथ इस इंटरव्यू में उन्होंने पत्रकारिता के अनुभव, काम करने में आई मुश्किलों के अलावा कई और ज्ञानवर्धक बाते बताई हैं. आप उन्हें यहाँ ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं @SushantBSinha


आपने पढ़ाई इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में की हैपढ़ाई करते वक्त आपके क्या सपने थे?

एक्चुली यह पढ़ाई शुरू करने के पहले से ही मैं एंकर बनना चाहता था. मैं बिहार से हूँ और मेरे पूरे परिवार में कोई जर्नलिज्म में नहीं था. तो मेरी पढ़ाई मेरी बैकअप के तौर पर थी कि अगर मैं जर्नलिस्ट नहीं बन पाया, अगर एंकरिंग नहीं कर पाया तो? उस वक्त आईटी सेक्टर बूम पर भी था. लेकिन पढ़ाई करते वक़्त भी जब एंकरिंग के मौके मिल रहे थे तो कर रहा था.

जर्नलिज्म में कैसे आना हुआ?

जब पटना में थे तो न्यूज़ चैनल्स देखा करते थे. तो उस दौरान मुझे लगा की यह काम किया जा सकता है. और एंकरिंग का खास तौर पर शौक था. मैं अपने स्कूल St. Xavier’s  में एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में रहता था. बोलने की क्षमता पहले से थी और समझने की क्षमता वहां पर विकसित हुई. उसी दौरान पटना में एक लोकल चैनल शुरू हो रहा था, न्यूज़ लाइन. वहां मौका मिला और वह मेरी पहली नौकरी थी.

मेरा इंटरेस्ट था जर्नलिज्म की तरफ… लोगों के लिए कुछ करना है. उस दिशा में बढ़ा और बढ़ता चला गया.

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आपने पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं की है?

नहीं. मैंने पत्रकारिता में सबकुछ काम कर के ही सीखा है.

NDTV में आपने 5 साल काम किया है, वहां का अनुभव कैसा रहा?

वहां बहुत कुछ सीखने को मिला, बहुत सारे ऐसे लोग थे जो पत्रकारिता के बहुत अनुभवी लोग हैं. मैं इस मामले में भी खुशकिस्मत रहा कि जब मैं वहां गया तब विनोद दुआ वहां थे. उनके साथ काम करने का भी अनुभव मिला. मुझे आज भी याद है 2012 की 11 मार्च की तारीख थी जब विनोद दुआ मेरे पास आए और कहा – मुझे तुम्हारी एंकरिंग बहुत अच्छी लगती है, आप बहुत अच्छे एंकर हैं. तो वह तारीफ मेरे जेहन में बैठ गई. क्योंकि उनको लेकर हमलोग इतना सोचते है, उनको आइडल की तरह देखते हैं. वो पर्सनली आये और ऐसा बोले… तारीफ तो बहुत लोग करते है लेकिन जिनको आप पसंद करते हैं, वो जब आपका काम पसंद करते हैं, तो वह अलग ही अनुभव होता है. यह उनका बड़प्पन ही था.

वहां बहुत सारे ऐसे पत्रकारों के साथ काम करने का मौका मिला जो यह आज कल का ट्रेंड हो गया है कि खबरों में मसाला लगा कर दिखाना – उससे बिलकुल अछूते हैं. उनको पता ही नहीं है ऐसा कैसे करते हैं. तो जब आप उनके साथ काम करते हैं तो आपका अनुभव बढ़ता है, खबरों की समझ बढ़ती है. तो NDTV में मैं एक जर्नलिस्ट के रूप में ग्रो किया.

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आपने NDTV क्यों छोड़ा?

NDTV इस लिए छोड़ दिया क्योंकि मुझे इंडिया न्यूज़ से ऑफर आया था और वहां मेरे लिए मौके ज्यादा थे. NDTV में एक समस्या यह है कि मौके थोड़े सीमित हो जाते हैं. तो यहाँ एक नया मौका था. मैं अपने आपको ज्यादा एक्स्प्लोर करना चाहता था. अभी मेरे पास करने के लिए यहाँ अलग से शोज़ हैं. मेरा अपना एक शो प्रश्नकाल है जिसमे हम न्यूज़ एनलिसिस करते हैं. मैं गंभीर विषयों को उठा सकता हूं. यहाँ पर मैंने स्कूल फीस को लेकर 3 महीने कैंपेन चलाया, अपने प्रोग्राम में जवाब तो देना होगा. और TRP को हमने ताक पर रख दिया, और इसके लिए मैं अपने मालिक कार्तिकेय शर्मा की तारीफ करूँगा कि उन्होंने मुझे यह करने की आज़ादी दी. किसी और चैनल में इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह तीन महीने लगातार एक ही विषय पर डिबेट करता रहे. स्कूल से, सीबीएसई से, शिक्षा मंत्रियों से, जवाब मांगता रहे कि स्कूल फीस के नाम पर यह धंधा बंद क्यों नहीं हो रहा. और उसका इम्पैक्ट दिखने लगा. आप यकीन नहीं करेंगे दूसरे चैनल से लोग फोन करके यह बोलने लगे की हमारे बच्चों के स्कूल में ऐसा हो रहा है. प्लीज इसका मुद्दा भी उठाइए. जबकी उनके पास अपना चैनल है.

न्यूज़ एंकर बनना, बुलेटिन पढ़ना, यह तो ठीक है. रिपोर्टिंग के लिए भी मैं NDTV में जाता था कभी-कभार. लेकिन जो मैं करना चाह रहा था उसके लिए मुझे प्लेटफार्म इंडिया न्यूज़ से मिला.

अगर आपको इंडियन जर्नलिज्म का एक रिव्यु देना हो तो कैसे देंगे?

अभी हम लोगों को बहुत ग्रो करने की जरूरत है. एक बहुत ज़्यादा बड़ा ठहराव खासकर हिन्दी न्यूज़ चैनल्स में आ गया है. चाहे वो भाषा के स्तर पर हो या कुछ और. एक ही शब्दों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है. वही चीज़ें, वही अंदाज, वही विज़ुअल… हालांकि बदलाव हुए हैं थोड़े बहुत, पर वह उस स्तर पर नहीं है जिस स्तर पर होना चाहिए.

और जो गंभीर विषय है उन्हें उठाने से बहुत से न्यूज़ चैनल्स डरते हैं क्योंकि कई बार उनकी TRP नहीं आ पाती. और ऐसे में जो बहुत अहम मुद्दे हैं…जर्नलिज्म का मतलब ही यही था की आप लोगों की आवाज़ बनें…लोग देखना क्या चाहते हैं यह एक अलग विषय है. और आपको क्या दिखाना चाहिए यह एक अलग विषय. लोग तो सिनेमा देखना चाहते हैं तो आप न्यूज़ चैनल पे थोड़े दिखाने लगेंगे.

दिखाना वो चाहिए जो लोगों की आवाज़ है, लोगों की तकलीफ है जो सरकारों तक आपके माध्यम के बिना नहीं पहुँच सकती. और यह ज़्यादातर हिन्दी न्यूज़ चैनल्स में नहीं हो रहा है. हिन्दी न्यूज़ चैनल अभी एक सेक्टर में फंसा हुआ है, जहाँ से TRP आती है. जिसमें UP, मुंबई, दिल्ली हैं. हर शहर की तो बात ही नहीं होती. और हम इंडिया के न्यूज़ चैनल हैं तो इंडिया तो मिसिंग है न न्यूज़ चैनल से?

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने की इच्छा रखने वाले स्टूडेंट्स को किन-किन चीज़ों का ध्यान रखना चाहिए?

आप को सबसे पहले खुद से यह पूछना चाहिए की आप यह क्यों करना चाहते हैं. मैंने जब 15 साल पहले पत्रकारिता शुरू की थी, तब में और अब में फर्क आ गया है. अब कम्पटीशन और क्राउड बहुत ज्यादा है. अगर आपको सिर्फ दिखने का शौक है, और इसलिए एंकर बनना है, तो आप यहाँ सर्वाइव नहीं कर पाएंगे. क्योंकि आप देश भर के न्यूज़ चैनल्स के एंकर को अगर जोड़ लें तो संख्या 200 के पार भी नहीं पहुंचेगी. तो अपने आप से पहले यह पूछिए कि आपमें ऐसा क्या है जो आप अपने आप को उस पद पर देखते हैं जहाँ पहले से कोई है. अगर जवाब मिलता है कि आपके पास कुछ तो भी है जो आप कर सकते हैं. चाहे जो पहले से हैं उनसे ज्यादा ना हो, उसके बराबर ही हो, तब तो ठीक है लेकिन अगर उसके बराबर नहीं है तो या तो खुद को बनाने की कोशिश कीजिए और नहीं तो फिर रास्ता बदल लीजिए. लोगों को बाहर से लगता है की पैसा है, ग्लैमर है, नाम है लेकिन ऐसा होता नहीं है. यहाँ आने के बाद एक बहुत लम्बी लड़ाई है जो लड़नी पड़ती है.

आज कल के बच्चों के पढ़ने का दायरा बहुत सीमित है. ना वो न्यूज़ पेपर्स पढ़ते है, ना ही वेबसाइट पर जाते हैं, ना ही साहित्य पढ़ते हैं. तो पढ़ना बहुत ज़रूरी है. भाषा को मज़बूत करना ज़रूरी है. अगर आपको मौका मिले तो उसे हाथ से न जाने देने के लिए.

आपको काम करते हुए किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा? 

दिक्कत तो बहुत सारी आती है हर किसी के जीवन में. मुझे भी जूझना पड़ा है अपने स्तर पर. हालांकि, मैं बहुत खुशकिस्मत रहा हूँ, क्योंकि इस इंडस्ट्री में आपका कोई जैक होना चाहिए तो रास्ता आसानी से मिल जाता है. पर मेरा काम देख कर बहुत सारे लोगों ने मुझे मौके दिए. लेकिन हर संस्थान की अपनी चुनतियाँ होती हैं. कई जगह सीनियर अगर अच्छा नहीं भी कर रहे तो आप उनको सरपास कर के आगे नहीं जा सकते. कई बार TRP की limitations हो जाती है. कई बार मौके मिलने पर आप आगे नहीं बढ़ पाते जैसा आप सोचते हैं. तो यह दिक्कतें इस इंडस्ट्री की हैं और रहेंगी.

इंटर्न्स को काम करने के पैसे मिलने चाहिए या नहीं?

मुझे ऐसा लगता है कि मिलना चाहिए. क्योंकि किसी से भी अगर आप फ्री में काम कराएँगे ना तो उसकी सीखने की इच्छा कम हो जाती है.

NDTV के संस्थापको के घर में सीबीआई रेड को आप कैसे देखते हैं?

मेरे पास इसमें ज्यादा कुछ कमेंट करने के लिए है नहीं. कोई भी जाँच एजेंसी अगर छापे मार रहीं है अगर उन्हें कुछ नहीं मिलेगा तो अपने आप ठंडे होकर बैठ जाएंगे. मेरे घर पर सीबीआई अगर आकर छपा मारे… तो जिस दिन मन करे आ कर मार ले. क्योंकि उसे कुछ नहीं मिलने वाला.

इससे समाज में कोई नेगेटिव इम्प्रेशन जाता है?

मुझे नहीं लगता. अगर छापे में कुछ नहीं मिलेगा तो नेगेटिव इम्पैक्ट सीबीआई पर पड़ेगा. और सिर्फ छापे से क्या होता है. एजेंसी को जो सबूत मिलेंगे उसे कोर्ट में साबित करना पड़ेगा. सिर्फ सीबीआई के छापा मारने से कोई बदनाम हो जाए यह मैं नहीं मानता. यह कभी एक दौर में रहा होगा.

जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स के लिए आपका क्या मेसेज होगा?

अगर आपका दिल करता है कि आप यह कर सकते हैं. अगर आप खुद से – क्यों जाना है इस फील्ड में –  सवाल का इमानदार जवाब जानकार भी मोटिवेटेड हैं कि यह करना है, तो जरूर आइए. लेकिन अपने उसूल को कॉम्प्रोमाइज़ मत कीजिए. कई बार नौकरी करेंगे तो कई चीज़ों को समझना पड़ता है कि ऐसा क्यों हो रहा है. वो समझना और सबकुछ बेच देना दो अलग चीजें होती हैं. तो अपने उसूल बेचिए मत. लड़िए, क्योंकि पत्रकारिता में लड़ने के लिए आए थे. उनके लिए जिनके लिए कोई नहीं लड़ता. अगर सिर्फ नौकरी और बैंक में सैलरी आ जाए के हिसाब से चलेंगे, जीवन भर झुकते रहेंगे. तो जीवन में किसी को इंस्पायर नहीं कर पाएंगे.

सौरभ द्विवेदी, एडिटर ऑफ़ द लल्लनटॉप: पत्रकारिता का काम राजसत्ता का चेरी बनकर उसकी तारीफ करना नहीं है


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