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औरत, फेमिनिज्म और लड़के: News18 की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय का  acadman.in से लंबी बातचीत.


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अपने शुरुआत के बारे में बताइए, आपकी पढ़ाई-लिखाई कैसे हुई?

न्यूज चैनल्स तब नहीं आए थे. मैंने 1998 में 12वीं किया. मीडिया का एक्सपोजर तब नहीं था. इलाहाबाद में परवरिश हुई. यूपी का एक शहर जितना कंजर्वेटिव होता है, पैट्रिआर्कल होता है, उतना ही था. गर्ल्स स्कूल में पढ़े. नॉर्थ के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन तक लड़के-लड़कियों की पढ़ाई अलग होती थी. सलवार, कुर्ती पहनकर, दुपट्टा संभालकर ही लड़कियां रहती थीं. कैंपस में कमेन्ट्स, छेड़खानी होती थी. इस तरह का माहौल आपको बहुत डराता है. अंदर से. और विद्रोही भी बनाता है. लेकिन, मैं अच्छी स्टूडेंट थी. स्कूल टाइम में टॉपर हुआ करती थी.

इलाहाबाद से फिर बॉम्बे गईं, फिर वहां क्या कीं ?

ग्रेजुएशन के बाद बॉम्बे गई. वहीं एसएनडीटी यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन की. लिखने पढ़ने का इंटरेस्ट बहुत था. स्कूल के दिनों से ही. घर में बहुत पॉलिटिकल माहौल थे. पिता ट्रेड यूनियन के नेता थे. कम्युनिस्ट थे. तब मैं नहीं जानती थी कि पत्रकार बनूंगी. मुंबई में अपनी सर्वाइवल के लिए काम करने के लिए जरूरत पड़ी तो मुझे यहीं काम आसानी से मिली. लिखने की, ट्रांसलेशन करने की या रिपोर्ट की.

अपनी पहली नौकरी के बारे में बताइए?

मैं पत्रकार नहीं बनना चाहती थी इसलिए मैंने पीजी के बाद लॉ किया था. एक साल पढ़ी, फिर अहसास हुआ कि ये विषय मेरे लिए नहीं है. तब मुझे नौकरी की जरूरत थी. नौकरी चाहिए थी. नौकरी मुझे दैनिक जागरण में मिल गई. फील्ड रिपोर्टर की नौकरी. पेज 3 जर्नलिज्म.

जो लड़कियां जर्नलिज्म में आना चाहती हैं, वे कैसे इस फील्ड में आ सकती हैं?

सबसे अच्छा तरीका है- 12वीं के बाद 5 साल का मास कम्यूनिकेशन करें. ग्रेजुएशन के बाद 2 साल का कोर्स भी कर सकती हैं. अब तो ये कोर्स बहुत कम्पलसरी जैसा हो गया है. साइंस, आर्ट किसी भी विषय से पढ़ने वाले छात्र इसे कर सकते हैं.

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किन संस्थानों से मीडिया की पढ़ाई करना ज्यादा बेहतर है ?

आजकल सबकुछ बिजनेस है. सारी यूनिवर्सिटी की उतनी वैल्यू नहीं है जितनी आईआईएमसी, एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, माखन लाल चतुर्वेदी कॉलेज की है. ये सब रेप्यूटेड जगह है जहां जर्नलिज्म की पढ़ाई सीरियस तरीके से होती है. गूगल पर भी आप देखिए, बहुत सारी कॉलेजों के बारे में जानकारी मिल जाएगी. आपको ढूंढना आना चाहिए.

एन्ट्रेंस के लिए करंट अफेयर्स मालूम होना चाहिए, न्यूजपेपर रोज पढ़ना.

क्या कभी आपसे किसी जर्नलिज्म स्टूडेंट ने ऐसा सवाल पूछा, जिसका जवाब आप नहीं दे पाईं हों ?

कई बार बच्चे जब पूछते हैं तो लगता है बड़ा ग्लैमर है, नाम है इस फील्ड में. उस बार लगता है कि कोई बच्चों को बताएं कि अंदर की दुनिया बहुत अंधेरी है. इन्सेक्युरिटी, इनस्टैबिलिटी है. वेज बोर्ड खत्म हो रहे हैं. जर्नलिज्म की सिर्फ बात नहीं है, प्राइवेट जॉब्स में ही इस तरह की दिक्कत है.

आपने इतने साल नौकरी कर ली है. ये दिन कैसे रहे, आप खुश रही हैं कुल मिलाकर अपनी प्रोफेशनल लाइफ से?

बहुत अच्छा रहा है. पढ़ने-लिखने, ऑब्जर्वेशन में रुचि थी और हमें इसके लिए मौका मिलता गया.

आप अपनी पहली और अपनी कुछ खास रिपोर्ट के बारे में बताएं?

आमिर खान की फिल्म लगान के ऊपर सत्यजीत भटकल ने (जिन्होंने बाद में सत्यमेव जयते बनाया) एक फिल्म बनाई थी- द मेकिंग ऑफ लगान. मैं गई वह फिल्म देखी और डायरेक्टर का इंटरव्यू किया. उसके बाद का मैंने जो पीस लिखा, वह पहला पीस था. इसे काफी सराहा गया.

वीमेन ट्रैफिकिंग पर एक स्टोरी की थी झारखंड जाकर. नाइट लाइफ इन स्मॉल सिटिज. वह भी एक अच्छी स्टोरी थी.

मीडिया के फील्ड में औरतों की क्या स्थिति है ?

जर्नलिज्म की दुनिया में औरतों की जगह धीरे-धीरे बन रही है, ये जगह अभी भी मेन्स स्पेस्ड है. बाकी समाज और दुनिया की तरह. अब ज्यादा संख्या में लड़कियां आने लगी हैं. पहले ऐसा नहीं होता था. आदमियों को अभी भी औरतों को उस जगह पर देखने की आदत नहीं है. उन्हें बोलने वाली औरतों की आदत नहीं है.

आपने कहां-कहां काम किया है ?

मैंने काम किया सीएनबीसी में, वेब दुनिया, दैनिक भास्कर, इंडिया टुडे में और अभी नेटवर्क-18 में हूं.

अगर आपके पास एक वैकेंसी है और बराबर क्वालिफिकेशन के साथ एक लड़का और लड़की आते हैं, तो क्या आप लड़की को प्रीफरेंस देंगी ?

हां, बिल्कुल, लड़कियों को प्रेफ्ररेंस दूंगी.

क्यों?

क्योंकि लड़कियों को मौका मिलना चाहिए. क्योंकि समाज में लड़कियों के लिए वैसे भी कम जगह है. उनका रिप्रजेंटेशन कितना कम है. परसेंटेज देखिए. 90 और 10 का रेशियो है जर्नलिज्म में आदमी और औरत का. वह भी अब जाकर हुआ है.

मृणाल पांडेय के अलावा एक औरत का नाम बताइए जो किसी अखबार या मैगजीन की एडिटर रही हों. इतने सालों के इतिहास में क्या एक भी महिला ऐसी नहीं हुईं जो संपादक बनने की क्वालिफिकेशन रखती हों. लेकिन ऐसा माहौल होता है कि आखबार महिलाओं को ऐसा ट्रीट नहीं करते हैं.

एडिटर जो हैं न उसके लिए सिर्फ इंटेलेक्चुअल स्किल नहीं चाहिए. एडिटर मैन्यूपुलेटर भी है. एडिटर नेताओं से मिल रहा है. मेन्स सेक्टर के पावरफुल लोगों से. औरतें ये सारी चीजें आदमियों के जैसे नहीं कर सकतीं. वह 9 बजे या 10 बजे ऑफिस से निकलने के बाद 11 बजे किसी नेता या बड़े अफसर के साथ पार्टी में नहीं बैठेगी. क्योंकि वह अफोर्ड नहीं कर सकती.

इंग्लिश में फिर भी महिलाओं ने एक्सेल किया है. क्योंकि उन्होंने जेंडर बैरियर को ब्रेक किया है. हिन्दी में आज भी उसका माहौल नहीं है.

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मीडिया में काम करते हुए आपके सामने क्या चैलेंजेज आए?

सबसे बड़ा चैलेंज रहा. अखबारों के दफ्तर के भीतर के पैट्रिआर्की से लड़ना. सब मर्द की तरह बिहैव करते हैं.

क्या आपने कभी किसी तरह के हरैसमेंट का सामना किया है? जिसे आपने इग्नोर किया हो?

हमेशा ऐसा होता है, किसी पार्टिकुलर पर नहीं जाऊंगी. लेकिन जहां पर एडवांटेज लेने की कोशिश की जाती है न, वह बहुत शटल तरीके से होता है. मैंने इग्नोर नहीं किया, मैंने जवाब दिया. मैं पुलिस या मैनेजमेंट के पास नहीं गई. उस आदमी के सामने भी तो बोला जा सकता है कि दो थप्पड़ खाओगे सा***.

क्या इंटर्न को पैसे मिलने चाहिए ?

मुझे लगता है मिलने चाहिए.

आप फेसबुक पर काफी लिखती हैंक्या कभी आपको लगा कि आपके लिखे से किसी की जिंदगी बदल रही है?

बहुत सारी लड़कियां, बहुत अप्रैशिएट करती हैं. चिट्ठियां लिखती हैं, मैसेज करती हैं, अपनी स्टोरी शेयर करती हैं, लेकिन सबसे अच्छा उस समय लगता है, जब लड़कें ये आकर कहते हैं- आपका पढ़कर हमें लड़कियों की बेहतर समझ पैदा होती है. उनको देखने का नजरिया मिलता है. मतलब अपनी मां को, बहन को, पत्नी को बेहतर समझ पाता हूं. आपने मुझे बेहतर इंसान बनाया… जब आकर लड़का ये बात बोलता है. उस समय लगता है लिखना सफल है.

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कई लोगों की नजर में फेमिनिज्म का एक निगेटिव इमेज बन गया हैहर चीज में इसे जोड़ दिया जाता है. इसे कैसे देखती हैं ?

यह बात बिल्कुल सही है. एक बात बताओ. सिर्फ 10 साल पहले. वाशिंग पाउडर का एक ऐड आता था, पत्नी बोलती थी, यह वाला पाउडर लगा लेते हैं, इनकी शर्ट अच्छा साफ होती है और इससे इनकी बिजनेस मीटिंग अच्छी हो जाती है. इसलिए ये पाउडर बहुत अच्छा है.

लेकिन आजकल का ऐड आता है. बाप बोलता है कि बेटा-बेटी को अलग अलग तरीके से पाला. और ये मेरी गलती है. नाउ शेयर द लोड.

अब सवाल है कि क्या कपड़े धोना सिर्फ लड़कों का काम है. मैं और कुछ नहीं कर सकता तो कपड़े तो धो सकता हूं.

जेंडर के सवाल को मार्केट ने भी हाईजैक कर लिया. उनको एड ने भी हाईजैक कर लिया. उनको वर्कफोर्स चाहिए.

हर स्त्री अपनी आजादी की राह पर, बराबरी के लिए बात करते हुए बहुत स्पष्ट और क्लिअर होगी, बहुत इंटलेक्चुअल होगी, बहुत समझदारी के साथ ही इन सब चीजों को देखेगी, ऐसा नहीं होगा न. जब आउटरेज होगा तो बहुत सारी गलतियां भी होंगी. बहुत सारे रिएक्शन भी होंगे. बहुत सारे लोग उसको यूज भी करेंगे. दलितों की लड़ाई का भी बहुत सारे लोगों ने इस्तेमाल किया.

दहेज और रेप के कानून का देश में कितना गलत इस्तेमाल हुआ है. कितनी ही बार निर्दोष लोगों को इस कानून से परेशानी उठानी पड़ी है. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि कानून ही गलत है.

फेमिनिज्म का मतलब क्या है ?

फेमिनिज्म का मतलब आदमी और औरत के बीच लड़ाई नहीं. इसका मतलब बहुत अच्छे से एक साथ रहना है. इसका मतलब यह है कि मर्द और औरत ज्यादा मोहब्बत के साथ, ज्यादा दोस्ती के साथ, ज्यादा खुशी के साथ, ज्यादा एक दूसरे की परवाह करते हुए, कैसे रह सकता है.

एक सोशल बिहैवियर ये कि कई पैरेंट्स अपनी लड़कियों को खुलकर नौकरी करने की इजाजत देते हैं. लेकिन लड़के चुनने की नहीं. नौकरी कर रही आत्मनिर्भर लड़कियां भी शादी घर वालों की पसंद से करती हैं. इस सोशल इश्यू पर क्या कहेंगे ?

समाज अभी ट्रांजिशन के फेज से गुजर रहा है. लड़कियों को पढ़ाना कितना दिन पहले शुरु हुआ इस देश में? वह भी तब हुआ जब लगा कि शादी के लिए कम से कम ग्रेजुएट लड़कियां मांगी जा रही हैं. लड़कियां ग्रेजुएशन करने लग गईं. सबसे ज्यादा लड़कियां हिंदी संस्कृत में ग्रेजुएशन करती थी, ताकि आसान हो. अब भी समाज एक ट्रांजिशन से गुजर रहा है. लोग काफी कंजरवेटिव हैं. सामंती सोच है. समय लगेगा चीजों को धीरे धीरे ठीक होने में.

मनीषा, क्या आप शादी करना चाहती हैं, या अकेले रहना चाहती हैं ?

सवाल यह नहीं है कि मैं शादी करना चाहती हूं या नहीं या अकेले रहना चाहती हूं. सवाल यह है कि हम सभी मनुष्यों को एक दूसरे का साथ तो चाहिए ना. इंसान अकेला रहने के लिए बना नहीं है. डिजाइन नहीं है उस तरह का उसका. लेकिन आज समाज में गैर शादीशुदा लड़कियों की संख्या बढ़ रही है. उसकी वजह कहीं ना कहीं वह सामाजिक असंतुलन तो है ना.

मान लो मैंने पढ़ाई नहीं की होती, मेरे मां-बाप ने मुझे पढ़ाया नहीं होता, मैं 12वीं पास की होती वहीं से हिंदी में बीए कर लिया होता. इलाहाबाद से कभी बाहर नहीं निकली होती. भाई कॉलेज छोड़ने जाता, भाई कॉलेज पर लाने जाता, तो मेरा कोई दुनिया का एक्सपोजर ही नहीं होता. वह लोग जहां शादी कर देते वहां चले जाते.

जब मेरा एक्सपोजर हुआ, जब मैं घर से बाहर निकली, मैं दूसरे शहर में गई, तब मुझे यह एहसास हुआ कि जीवन उस छोटे से दायरे से, उस कुआं से बहुत बड़ा है. जीवन का अर्थ, जीवन का मकसद, उस छोटी सी चीज से कहीं बड़ी है. उस एक्सपोजर ने मुझे यह दिया कि शादी से भी जरूरी कई चीजें हैं. इज्जत वाली शादी, सम्मान वाली शादी, प्यार वाली शादी, ऐसा रिश्ता जिसमें इक्वलिटी हो. और क्योंकि समाज में लड़के अभी उन सब चीजों को एक्सेप्ट करने के लिए तैयार नहीं है तो हमें हमारी तरह के लड़के नहीं मिलते.

मेरा प्रॉब्लम यह नहीं है कि मैं शादी नहीं करना चाहती या मुझे लड़के अच्छे नहीं लगते या लड़कों से प्यार नहीं करती या वह सारी नेचुरल ऑर्गेनिक डिजायर नहीं है. दिक्कत यह है कि जिस तरह का लड़का मुझे चाहिए वह नहीं मिलता आसपास के सर्कल में.

जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स के लिए मनीषा पांडेय का मैसेज?

अच्छा लिखने की कोशिश करें. अच्छा लिखा, हमेशा अपना पाठक तलाश लेता है. अच्छा लिखने का कोई नियम नहीं है. किसी कोर्स में, किसी यूनिवर्सिटी में कभी आपको कोई नहीं सिखा सकता कि अच्छा कैसे लिखते हैं. अच्छा लिखना अच्छा पढ़ने से आता है. खूब सारा पढ़ने से, खूब ट्रेवल करें. जीवन में जितने अनुभव होंगे हम उतने समृद्ध होंगे. और जजमेंटल ना हों.

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