Amit Pathe is a journalist and currently working as a designer at Dainik Bhaskar Group. He has a working experience of around six years in the field. you can follow him of twitter at amitpathe

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How would you like to introduce yourself to our readers, who are mostly young students across India? Please tell us about your family back ground.

मैं अमित पाठे हूं। मिडिल क्लास और छोटे कस्बे से आता हूं। मप्र का आदिवासी बहुल जिला बैतूल के सारनी कस्बे से। घर में सबसे छोटा। सबसे बड़ी बहन और बड़े भइया। पापा कोल इंडिया से रिटायर्ड हैं। वो किसान के बेटे थे, निरक्षर हैं। मम्मी गृहणी हैं, पढ़-लिख लेती हैं। लेकिन उन्होंने हम बच्चों को पढ़ाने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। तंग हालातों में जिये, सीमित संसाधन में ज़िंदगी काटी। क्योंकि वो चाहते थे कि वो नहीं पढ़ पाए लेकिन उनके बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें, आगे बढ़ें।

उदासीन व्यक्ति अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता: के.जी सुरेश, आईआईएमसी महानिदेशक

Where did you go for your school education? What were your aspirations then?

सारनी से मेरी स्कूलिंग हुई। सरकारी, हिंदी मीडियम स्कूल से। 5वीं तक तो मैं गायत्री परिवार के स्कूल से पढ़ा हूं तो वहां मैंने मैथ्स तक हिंदी के अंक १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ से पढ़ी। जब 6वीं में गया तो स्कूल बदला तो वहां पहली बार वन, टू, थ्री से पढ़ाई शुरू की। वहां एक्सपोज़र बहुत सीमित था। अगर आप में कुछ करने और आगे बढ़ने की बहुत ललक न हो तो आप वैसी जगह से निकल के कुछ अच्छा शायद ही कर पाए। 2004 में। 10वीं फर्स्ट डिवीज़न से पास होने और मैथ्स में 100 में 87 नंबर आने पर प्रिंसिपल ने 11वीं में मैथ्स दे दिया था। इसमें स्टूडेंट्स की कोई चॉइस नहीं होती थी, ये सिर्फ मार्कशीट और प्रिंसिपल पे निर्भर करता था। उसी समय पता चला कि इसी साल से स्कूल की फीस दोगुनी हो गई है। पापा के लिए उतनी फीस भरना आसान नहीं था। तो मैंने अपने हाथ से लिखकर इसकी ख़बर बनाई। फीस कितनी थी और कितनी बढ़ गई, इससे गरीब स्टूडेंट्स पर क्या असर होगा, क्षेत्र में अच्छे स्कूल कम हैं…। इन सब पे आधारित ख़बर को लिफाफे में डाला और दैनिक जागरण के जिला ऑफिस भेज दिया। उस समय ख़बरें बस से भेजी जाती थी। फैक्स भी कर सकते थे लेकिन वो महंगा होता था। लिफाफे पे प्रेस और अख़बार का नाम लिख के बस ड्राइवर को दे दो, तो वो फ्री में लिफाफा पहुंचा देता था। इस तरह मेरी लिखी ख़बर भी जागरण के जिला ऑफिस पहुंच गई। वहां से मेरे दोस्त जो मुझसे 10 साल बड़े थे उन्हें कॉल आया। कि आपके वहां से स्कूल फीस की एक ख़बर आई है। मेरे दोस्त ने कहा कि हां, हां भिजवाई है, मेरे दोस्त ने ही लिखी है, हो सके तो उसका नाम भी दे दीजियेगा। अगले दिन जागरण के रीजनल पेज के टॉप पे मेरी बाइलाइन ख़बर छपी थी। वो मेरी पहली बाइलाइन थी। उसके बाद मैं स्कूल में पत्रकार के रूप में पहचाना जाने लगा। 12वीं तक जैसे तैसे पढ़ाई की।

What motivated you to pursue career in Mass Com? How you landed in Devi Ahilya Vishwavidyalaya? Apart from studies which were other activities in which you were involved passionately?

साल 2006। स्कूलिंग हो जाने के बाद करियर को लेकर बड़ी दुविधा थी। कोई गाइड करने और एडवाइज देने वाला नहीं था। मैंने ही अख़बार में एडमिशन नोटिस का ऐड देख के फॉर्म डाउनलोड करवाया, डीडी बनाया और फॉर्म भर के DAVV इंदौर भेज दिया। वहां जाकर एंट्रेंस एग्जाम और इंटरव्यू दिया। उसमें मेरा सिलेक्शन हो गया। तब लोग मास कम्युनिकेशन से अंजान थे। जब तक मीडिया का कोर्स नहीं बताओ कम लोग ही समझ पाते थे। यूनिवर्सिटी में पढ़ने से काफी एक्सपोज़र मिला, पर्सनालिटी का बेसिक सुधारना शुरू हुआ। रेग्युलर क्लास अटेंड की। हर लैक्चर में बैठा। हर असाइनमेंट ईमानदारी और मेहनत से किया। अच्छे मार्क्स से ग्रैजुएट हुआ।

Experiences of your internships. Any remarkable experience that shaped your career? 

ग्रेजुएशन में लास्ट सेमेस्टर के आखिरी दिन ही मैंने इंदौर में ही हिंदी अख़बार पत्रिका में इंटर्नशिप शुरू कर दी थी। मैंने उस अख़बार के लिए अपने ही कॉलेज का एनुअल फंक्शन कवर किया। यूनिवर्सिटी की एंटी खबरें कीं। फाइनल एग्जाम्स के दौरान भी मैं रिपोर्टिंग ही कर रहा था। रेग्युलर क्लासेज अटेंड करता था तो एग्जाम के टाइम मुझे कुछ रटने या रिवाइज़ करने की जरूरत नहीं पड़ी। उठता था और एग्जाम दे आता था, वहां से रिपोर्टिंग और शाम ढलते अख़बार के ऑफिस

Eventually you went to IIMC for post graduation diploma in Hindi Journalism? Would you describe its importance? How it helped you in your career?

जब ग्रेजुएशन के बाद इंटर्नशिप चल ही रही थी तो कॉलेज के ही एक फ्रेंड ने मुझे IIMC के एंट्रेंस का फॉर्म भरने के लिए कहा। उस समय 1100 रुपये का फॉर्म मेरे लिए बजट से बाहर था। मेरे एक करीबी प्रोफेसर के कहने पर मैंने फॉर्म भर दिया। उनका कहना था कि बेटा रिटन एग्जाम में तो तुम्हारा हो जायेगा, भर दो। मैंने अलग से कोई तैयारी किये बिना एंट्रेंस और इंटरव्यू दिया। और हिंदी पत्रकारिता कोर्स के लिए सेलेक्ट हो गया। इसमें मेरी उस इंटर्नशिप का बहुत बड़ा हाथ रहा। उससे मेरा कॉन्फिडेंस बढ़ा, मीडिया की बेसिक समझ डेवलप हुआ और लिखना आया।

You started your career form Rajasthan Patrika. Please describe to us your role and experiences there. How you managed to get placed there?

IIMC से कोर्स पूरा होते होते। साल 2010 का अंत और 2011 के शुरुआती महीने वैश्विक आर्थिक मंदी का समय था। मीडिया भी इसकी चपेट में था तो नई जॉब मिलना तो दूर की बात, वहां कॉस्ट कटिंग और छटनी चल रही थी। हम सब अपने कैंपस प्लेसमेंट को लेकर चिंतित थे। शुरुआत में कोई मीडिया हाउस रेस्पॉन्स नहीं दे रहा था। तो सबसे पहले राजस्थान पत्रिका ग्रुप आया और मुझ सहित 9 लोगों का सिलेक्शन हुआ। मैं जयपुर अपनी पहली जॉब के लिए 14 मई 2011 को गया। 6500 रुपये की जॉब के साथ शुरुआत की। रिपोर्टिंग और डेस्क पे काम किया। दो-तीन कार्टून भी बनाएं। बाइलाइन फोटो भी ली। एक सर्वे भी किया।  कम सैलरी के कारण बहुत स्ट्रगल किया। बस और पैदल रिपोर्टिंग की। कई बार रूम से ऑफिस तक 3 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। बाद में मकानमालिक की एक्टिवा किराए से लेकर भी रिपोर्टिंग की। कई बार भूखे और बिना पंखे के सोया। उससे मेरी नींव मजबूत हो गई। लेकिन उतनी कम सैलरी में जयपुर में गुजारा करना मुश्किल हो रहा था तो कुछ महीने में वहां से इंदौर ट्रांसफर करवा लिया। उसी दफ्तर आ गया जहाँ से इंटर्नशिप की थी। उन सीनियर्स की कॉपी मेरे पास आने लगीं जिनके अंडर मैंने तब इंटर्नशिप की थी। वहां कुछ मन नहीं लगा तो जॉब छोड़ भोपाल आ गया।

You joined Guru Jambeshwar University of Science & Technology to pursue masters? How important it is for a journalist to pursue higher studies? What motivated you to pursue Masters in Mass Communication?

2012 में भोपाल आ गया। दैनिक भास्कर में 10000 CTC पे जॉब शुरू की। उसी दौरान मास्टर्स मैंने सिर्फ औपचारिकता के लिए किया। इससे पहले 4 साल मैंने यही पढ़ाई की थी। MMC के कोर्स में भी वही सब कुछ था। मैंने जॉब करते हुए बीच में छुट्टी लेकर एग्जाम दे दिए थे और आसानी से फर्स्ट क्लास से पास भी हो गया। दरअसल, IIMC से डिप्लोमा कर लेने के बाद इस यूनिवर्सिटी सहित कुछ जगह आपको सीधे MMC के सेकंड ईयर की पात्रता मिल जाती है जिसे लेटर्न एंट्री कहते हैं। मैंने भी उसी तरह सीधे सेकंड ईयर के एग्जाम देकर MMC की।

You joined DB Group afterward. Tell us your role and experiences there? 

इन दिनों दैनिक भास्कर के नए शुरू हुए इंग्लिश न्यूज़पेपर डीबी पोस्ट में हूं। यहां मैं करीब डेढ़ साल से बतौर डिज़ाइनर काम कर रहा हूं। इससे पहले मैं  2012 में दैनिक भास्कर में बतौर रिपोर्टर काम कर चुका हूं। दो साल से कुछ कम समय के लिया। उसके बाद बेहतर सैलरी मिलने पे नईदुनिया (जागरण ग्रुप) जॉइन कर लिया। दो महीने बाद लखनऊ से टाइम्स ग्रुप का नवभारत टाइम्स (NBT) लॉन्च हुआ तो वहां जॉइन कर लिया।

You worked with times group for more than two years. You role and experiences there?

डेढ़ साल वहां संतुष्टिजनक काम करने के बाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया के Delhi Times में मौका मिला तो वहां ट्रांसफर के लिए हामी भर दी। मुझे वहां रिपोर्टिंग और डिज़ाइनर का ऑप्शन मिला था। मैंने इंग्लिश मीडिया में स्विच करने का गोल्डन चांस मिस नहीं किया। तुरंत हां कह दिया। हिंदी का मोह भी था लेकिन हिंदी मीडिया का सैलरी और ग्रोथ चार्ट मैंने देख ही लिया था। इस स्विच से मुझे एक्सपोज़र का अच्छा जम्प मिल रहा था तो मैं दिल्ली चला गया। वहां डिजाइनिंग की बेसिक से शुरुआत की। बहुत मेहनत की और जल्दी सीखा। इंग्लिश मीडिया के वर्क कल्चर को समझने का मौका मिला। एक दिन दूर कहीं रिपोर्टिंग पे जाना था, बॉस ने मुझे बुलाया और कहा कि कल सुबह यहां रिपोर्टिंग पे जाना है, फोटो भी तुम अपने कैमरे से खुद ही खींच लेते तो वो भी कर ले आना और दोपहर तक सबमिट कर देना। बॉस के पास बैठी मैम ने कहा कि आप हिंदी में मुझे भेज देना मैं ट्रांसलेट कर दूंगी। बॉस ने कहा, नहीं वो इंग्लिश में ही लिखेगा। मैम मौके ऐसे ही मिलते हैं। मेरी बाइलाइन फोटो हाफ पेज में मेरे बाइलाइन कवरेज के साथ छपी। उसके बाद मुझे 5-6 रिपोर्टिंग असाइनमेंट और भी मिले।

Amit Pathe with Alia Bhatt
How much grades matter in securing a job in mainstream media?  Tell us about other activities which play a major role in securing a job.
आप अपनी जॉब प्रोफाइल से कितना ऊपर जाकर काम करते हैं, कितना क्वालिटी वर्क और स्मार्ट वर्क करते हैं यही आपकी जॉब बचाता है। आपकी मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती कहीं न कहीं कभी न कभी उसका रिटर्न मिलता ही है। मेरा मल्टीटास्किंग होना हमेशा फायदेमंद रहा। और आपके संपर्क ही आपको मीडिया में जॉब दिलवाते हैं।
Did you find that the colleges/institutions had prepared you sufficiently for the many tasks you were required to execute during your internships and later at your Job?
मीडिया में मैंने जितनी पढ़ाई की और जब जॉब करने गया तो समझ आया कि पढ़ाई किसी दूसरी ही दुनिया की थी। उसमें मीडिया की व्यवहारिक बातें और ट्रेनिंग कम ही थी। ग्रेजुएशन के समय की पढ़ाई तो बेहद किताबी थी। कई प्रफेसर ऐसे थे जिन्हें खुद मीडिया का अनुभव नहीं था और जिन्होंने कभी एक कॉलम ख़बर नहीं लिखी थी। सिर्फ किताबी सबकुछ। डिजिटल दौर में हमें कुछ प्रफेसर पुरानी किताब से कॉम्पोज़िटर पढ़ा देते थे। IIMC में तो बहुत अनुभवी प्रफेसर होते हैं, इंडस्ट्री के एक्सपर्ट भी पढ़ाने आते हैं। लेकिन आप मीडिया की पढ़ाई मात्र से मीडिया-रेडी नहीं बन पाते। इंटर्नशिप्स काफी मदद करती है लेकिन आखिरकार आपके जॉब शुरूआती 3-4 साल ही आपको पूरी तरह तैयार कर पाते हैं।
You again joined DB Group in Nov. 2015. How would you describe your present job there? Role, experience and working environment? How you became a designer? 
डिज़ाइनर मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ही बन गया था लेकिन वहां पोस्ट कोरेस्पोंडेंट ही थी। बतौर डिज़ाइनर पोस्ट यहीं जॉइन किया था। टाइम्स के बाद एक दो जगह हिंदी अख़बार में भी बात हुई लेकिन इंग्लिश में मेरी वर्तमान सैलरी के मुकाबले ऑफर नहीं मिल रहा था तो मैंने नवम्बर 2015 में दैनिक भास्कर के लॉन्च होने जा रहे इंग्लिश अख़बार डीबी पोस्ट में जॉइन कर लिया।
Would you like to compare work environment at the two big media houses which you worked for?
मैंने ज़्यादा समय टाइम्स और भास्कर ग्रुप में ही गुजारा है। हिंदी और इंग्लिश मीडिया दोनों का वर्क एन्वायरनमेंट बिल्कुल अलग है। जमीन आसमान का अंतर है। इंग्लिश ग्रुप में बड़े रिलैक्स्ड वे में काम होता है। प्रेसर हिंदी की तुलना में कम होता है। लोग आपसे कम और काम से ज़्यादा मतलब रखते हैं। अधिकतम 8 काम लिया जाता है। छुट्टियां आसानी से मिलती हैं। आपको निचोड़ा नहीं जाता। कहीं ज़्यादा सुविधाएं मिलती हैं। कई भत्ते मिलते हैं। सैलरी हाइक अच्छी मिलती है। वीकली ऑफ बराबर मिलते है और उस दिन ऑफिस से कभी आपको कॉल नहीं आता। आपकी पर्सनल लाइफ से किसी को कोई मतलब नहीं होता…आदि आदि। जबकि हिंदी मीडिया में इस सब के उलट और बुरे हैं। इसलिए मैंने हिंदी मीडिया से स्विच कर लिया।
What are the pros and cons of making career in print journalism in today’s digital world?
मैं अब किसी को प्रिंट में आने की कतई सलाह नहीं देता। जियो के बाद देश में आई इन्टरनेट क्रांति ने परिदृश्य बहुत तेजी से बदल दिया है। डिजिटल की रीच बढ़ गई है। न्यू जनरेशन तो अख़बार उठा के देख भी नहीं रही। अब से 5-7 साल में प्रिंट मीडिया के आगे डिजिटल बहुत बड़ा बनकर खड़ा हो जायेगा। प्रिंट का महंगा होना, छापना-पहुंचाना उसे खा जायेगा। हां, अखबारों के epaper एडिशन चलते रहेंगे।
How difficult it is to shift from Hindi Journalism to English; especially when one has went to Hindi medium school; hails form a village and not excellent with English?
स्विच करने के अवसर ना के बराबर है। अगर आप मेरी तरह हिंदी मीडियम से पढ़े हैं तो और मुश्किल। लेकिन अगर अवसर मिल जाए तो आप धीरे-धीरे शुरुआत तो कर ही सकते हैं। जगह भी बना सकते हैं। बस आपमें थॉट प्रोसेस होनी चाहिए, लैंग्वेज तो धीरे-धीरे आ ही जाती है। वैसे भी अख़बार की खबरिया भाषा बहुत व्यापक और साहित्यिक नहीं होती है। लेकिन वहां अगर आप शुरुआत कर रहे हैं तो ध्यान रखिए कि इंग्लिश में आपको बहुत सीखना है क्योंकि वहां उस भाषा के एक्सपर्ट बैठे हैं और आप नौसिखिये हैं।

What is your view on media becoming irresponsible and showing fact less episodes?

मेरी कोई पवित्र गाय नहीं  है जो उससे हमेशा आदर्श रहने की ही बात की जाए। मीडिया एक ख़ालिस बिज़नेस है, जो हमें मानना होगा। हां ये एक जिम्मेदारी से भरा बिज़नेस भी है। लोकतंत्र का हर स्तंभ अच्छा-बुरा दोनों करता है।

What would be your parting message to students and young journalists?

प्रिंट के सिमित होने के साथ डिजिटल मीडिया की बाढ़ आ जायेगी। जो अभी से दिखना शुरू भी हो गई है। डिजिटल में बहुत जॉब सृजन होंगे। छोटे-छोटे मीडिया हाउस। कई तो घर या एक छोटे ऑफिस से चलेंगे। कुछ चंद द्वारा अपने-अपने घर से चल रहे होंगे। पार्टटाइम जॉब देकर डिजिटल मीडिया अपनी जरूरत पूरी करेगा। एक समय ऐसा आएगा जब आप अपनी टीम के को-वर्कर से कभी आमने-सामने नहीं मिले होंगे। अपने-अपने घरों से काम कर रहे होंगे। वर्क कल्चर बदल जायेगा। छोटे और स्पेसिफिक मीडिया मॉडल चलेंगे।
अगले 10-15 साल मीडिया में बहुत उथल-पुथल होगी। इस लिहाज से ये सरकारी जॉब टाइप जॉब सिक्योरिटी देने वाला सेक्टर तो कतई नहीं होगा। नए मीडिया प्रफेशनल्स को फ्लेक्सिबल होना पड़ेगा। इन दिनों कोई मुझसे मीडिया की पढ़ाई करने के लिए कहता है तो मैं साफ मना कर देता हूं। क्योंकि पढ़ाई में कुछ इंट्रेस्टिंग नहीं है और वर्क कल्चर और जॉब सिक्योरिटी भी नहीं है। लेकिन एक बात है ये जॉब बड़ी इंट्रेस्टिंग है। रोज कुछ नया करने को मिलता है। क्रिएटिव, मेहनती और स्किल्ड लोगों के लिए हमेशा काम और पैसा है।

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