Saroj Kumar is a journalist, currently working with India Today Magazine (Hindi). In this interview he has talked about his educational and professional journey. You can follow him on twitter at @Krsaroj

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How would you like to introduce yourself to our readers who are mostly young students across India? Please tell us about your family back ground.

अभी मैं इंडिया टुडे समूह में बतौर सीनियर सब-एडिटर काम कर रहा हूँ इंडिया टुडे हिन्दी पत्रिका के लिए. मैं अपने घर से पहला पत्रकार हूँ, और ईमानदारी से मैं यह स्वीकार करना चाहता हूं कि मैं इस क्षेत्र में संजोग से आया. बेशक मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं थी और मेरे परिवार में किसी ने भी (हां, मैंने भी) इस व्यवसाय के बारे में सोचा तक नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह इसलिए था क्योंकि मैं एक दलित परिवार से हूँ और इस क्षेत्र में मेरे परिवार, रिश्तेदार यहाँ तक की मेरे समुदाय का भी कोई परिचित व्यक्ति नहीं था।  मेरे पिताजी ने अपने कैरियर को सिपाही (कांस्टेबल) के रूप में शुरू किया और अब वे बिहार पुलिस में उप-निरीक्षक हैं। उस समय वह वंश के पहले व्यक्ति थे (मेरी माँ की ओर से भी) जिन्हें नौकरी मिली थी. अन्यथा सभी रिश्तेदार मजदूर थे या दुसरे के खेतों में काम करते थे. अब वे विभिन्न कारखानों में मजदूर के रूप में काम करने के लिए बड़े शहरों में चले गए हैं। मेरे पिता के पास एक बेहतर दृष्टी थी जिसकी वजह से उन्होंने हमारी शिक्षा पर ध्यान दिया. यही कारण है कि आज आप मेरा साक्षात्कार कर रहे हैं और मेरा बड़ा भाई अब सॉफ्टवेयर इंजीनियर है.

Where did you go for your school education? What were your aspirations when you were in school?

आज मैं सोचता हूं कि अगर नवोदय विद्यालय नहीं होते तो मैं कहां होता? इसका जवाब हैः पता नहीं!  क्योंकि उन दिनों मेरे परिवार के संघर्ष के दिन थे और मेरे माता-पिता मेरे भैया की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरा कराने के लिए जूझ रहे थे. इसी दौरान मैंने अपने औरंगाबाद जिले के बारुन नामक जगह पर स्थिति नवोदय विद्यालय में प्रतियोगी परीक्षा के जरिए प्रवेश पाने में सफल रहा. इस आवासीय विद्यालय में मुझे सरकारी खर्चे पर मुफ्त में 6वीं से 12वीं तक पढ़ाई पूरा करना का मौका मिला. जैसा कि स्कूल के दिनों में हर किसी की तमन्ना होती है, मैं भी आइएएस या आइपीएस अधिकारी बनने का शौक पाले हुए था, हालांकि इसकी तैयारी मैंने कभी नहीं की. वहीं मेरे अभिभावक चाहते थे कि मैं भैया की तरह ही इंजीनियरिंग करूं और उसमें अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी पाऊं.

You did your graduation in Hindi form Banaras Hindu University. Why did you opt for Hindi? Tell us your experience at BHU.

दरअसल बचपन से ही मेरी रुचि साहित्य में थी और पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था. मेरे सबसे बड़े भाई विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं या किताबें लाते थे तो मैं चुपके-चुपके उन्हें पढ़ लेता था. बाद में नवोदय विद्यालय में प्रवेश लेते ही मेरे इस शौक पर उड़ान मिली क्योंकि वहां एक बड़ी अच्छी लाइब्रेरी थी. उस लाइब्रेरी में मैंने प्रेमचंद, शरतचंद्र, वृंदावन लाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन से लेकर बाद में निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती आदि की कहानियों और उपन्यासों में मैं चाट गया था. विडंबना यह थी कि मेरे अभिभावक मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे, जबकि मैथेमैटिक्स में मेरी रत्ती-भर रूचि नहीं थी. नवोदय के बाद भैया ने कुछ महीनों के लिए मुझे रांची और फिर पटना इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए भेजा. पटना में राजकमल प्रकाशन, वाणी प्रकाशनों की मौजूदगी और होने वाले विभिन्न बुक फेयर और सबसे ज्यादा हंस पत्रिका ने मुझे सच पूछिए तो “बिगाड़’ कर रख दिया. तभी मैंने 2008 में अचानक घर वालों को बिना बताए बीएचयू का फॉर्म भरा और साहित्य की पढ़ाई करने वहां चल पड़ा. इसकी नाराजगी मेरे भैया को आज तक है.

बीएचयू बिहार और उत्तर प्रदेश में पढ़ाई के मामले में बेहतर जगह है लेकिन वहां जाकर मैंने असल में समाज की नंगी सच्चाईयों से रूबरू हुआ. अकादमिक नजरिए से वहां बहुत कुछ है, इतनी बड़ी लाइब्रेरी से लेकर तमाम तरह की सुविधाएं. लेकिन अकादमिक जगत में भी जिस तरह धर्म और जाति के घालमेल है, यह मैंने वही देखा.

What do you think of the developments in BHU in recent years?

हालिया वर्षों में बीएचयू संक्रमण काल से गुजरता हुआ नजर आया है. एक ओर जहां वहां की लड़कियां भी अपने हकों को लेकर मुखर हुई हैं, वहीं दूसरी ओर सामंती और ब्राह्मणवादी ताकतों ने भी उसी तीक्ष्णता के साथ पलटवार किया है. बीएचयू में जातिवाद और भाई-भतीजावाद कोई नई बात नहीं है लेकिन इन दिनों यह वहां हिंसक तरीके से आक्रामक होता नजर आ रहा है. खासकर पिछले एक-दो वर्षों में.

What motivated you to join IIMC and pursue career in Mass Com? Please describe your experiences at IIMC? Apart from studies, in which other activities were you passionately involved?

दरअसल साहित्य के साथ-साथ मुझे फिल्मों में भी रूचि थी और मैं बनारस में हर हफ्ते दो-तीन फिल्में देख लेता था. पत्र-पत्रिकाओं में रूचि तो थी ही. इस वजह से मैं मास कम्युनिकेशन को लेकर आकर्षित था. पर इस ओर आने की तब भी नहीं सोचा था. फिर वहीं 2011 में हिन्दी साहित्य से ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष में मेरे भैया ने ही सलाह दी कि अब हिन्दी पढ़ ही चुके हो, उसमें नौकरी की दिक्कत तो होगी ही, अच्छा है तुम मास कॉम की तरह कोई प्रोफेशनल कोर्स कर लो. मैंने अखबारों में पढ़ रखा था कि आइआइएमसी मास काम का सबसे अच्छा संस्थान है सो मैंने मास कॉम के लिए वहां का भी फॉर्म अप्लाई कर दिया. जिस दिन मैंने बीएचयू मास कॉम की परीक्षा बनारस में दी, उसी के अगले दिन आइआइमसी की प्रवेश परीक्षा पटना में थी. मैंने शाम ट्रेन पकड़ी और रास्ते में ही थोड़ा-बहुत पढ़ा. बस इतनी-सी तैयारी की थी. मजे की बात यह है कि आइआइएमसी में मुझे बाद में पता चला कि मैंने प्रवेश परीक्षा में हिन्दी पत्रकारिता में देशभर में पहला स्थान हासिल किया है.

अगर नवोदय ने मुझे पढ़ने का मौका दिया था आइआइएमसी ने मुझे एक नजरिया और समझदारी दी. यही मैंने देश की राजनीति, समाज और उसके संबंधों को समझा और मुझमें एक दृष्टि विकसित हुई. कोर्स और जनसंचार के प्रशिक्षण के नजरिए से तो आइआइएमसी बेहतर था ही, लेकिन इसने जो दृष्टि मुझे अपने समाज के प्रति दी वह सबसे उल्लेखनीय है. चूंकि यह जेएनयू कैंपस में स्थित है सो पढ़ाई के अलावा मैंने बतौर प्रशिक्षु एक्टिविस्ट की तरह विभिन्न सामाजिक प्रदर्शनों में भी शामिल होने लगा. असल में यह मेरे परिपक्व होने का दौर था.

Did you have to face any negative discrimination for being a lower caste at BHU or IIMC or while trying to get a job?

बीएचयू में दलितों के प्रति जातिगत और मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिक भेदभाव आम बात है. मेरे कुछ दलित और मुसलमान सहपाठियों को इस तरह के भेदभाव का सामना करना भी पड़ा था. एक और बात बताना चाहूंगा कि बचपन में जब मैं नवोदय में पढ़ाई कर रहा था और विभिन्न जाति के सहपाठियों के साथ हॉस्टल में रहता, खाता-पीता, पढ़ता था तो इस तरह का भेदभाव कहीं नजर नहीं आया था. यहां तक कि बच्चों के मन में रत्ती भर इस तरह के ख्याल नहीं आते थे. लेकिन दूसरी तरफ ग्रेजुएशन में बीएचयू में आकर यह सब सुनना-देखना पड़ा. जाहिर है, जातिगत भेदभाव को जन्मजात नहीं आतीं बल्कि इसे ब्राह्मणवादियों के द्वारा निर्मित किया जाता है, खासकर इसके जिम्मेदारी बड़े लोग (अभिभावक) हैं. खैर, चूंकि उन दिनों तक मेरे घर की हालत थोड़ी ठीक हो गई थी और भाई इंजीनियर बन गए थे, इस वजह से मेरे पास मेरे बाकी दलित साथियों की तरह पैसे की दिक्कत नहीं होती थी बल्कि पॉकेट खर्च कुछ ज्यादा ही मिल जाता था. मैं अच्छा रहन-सहन कर लेता था, शायद यही वजह थी कि कईयों को शुरु में पता भी नहीं चला कि मैं दलित हूं और दूसरे हर जाति के मेरे दोस्त बन गए. इस वजह से मुझे व्यक्तिगत तौर पर किसी तरह का भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा. हां, कुछ सवर्ण जाति के कुछ उपद्रवी छात्र मुझसे खार जरूर खाए रहते थे क्योंकि मैं उनके उपद्रव के विरोध में खड़ा रहता था.

आइआइएमसी में मेरे लिए नया संसार था क्योंकि यहां कास्ट के साथ-साथ क्लास का फर्क भी स्पष्ट नजर आया. हालांकि हिन्दी पत्रकारिता में क्लास का फर्क नहीं था. आइआइएमसी में मुझे जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि उन दिनों विभाग की फैकल्टी समझदार और अच्छी थी. यह जरूर था कि कुछ सवर्ण छात्र छात्रों की जाति पता किया करते थे और क्लास में ऐसे मसलों पर बहस के दौरान आक्रामक रहा करते थे. एक बात और बता दूं कि मैं बचपन से ही मितभाषी रहा हूं, लेकिन आइआइएमसी में मैंने देखा कि दलितों-वंचितों और अल्पसंख्यकों के प्रति जिस तरह का भेदभाव है या सवर्ण छात्र जिस तरह से आक्रामक हैं, तब मुझे लगा कि ऐसे में मेरा बोलना जरूरी है और तभी मैंने मुखरता से वंचितों के हक में बोलना शुरू किया, जो आज तक जारी है.

जहां तक नौकरी पाने की बात है तो मेरे बैच में सबसे पहला कैंपस सेलेक्शन मेरा ही हुआ था, यानी हिन्दुस्तान अखबार के कैंपस सेलेक्शन में सबसे पहला स्थान मुझे हासिल हुआ था. कैंपस सेलेक्शन की वजह से मुझे वह नौकरी हासिल हुई थी, अगर कैंपस सेलेक्शन न हो तो दलित छात्रों को मीडिया संस्थानों में नौकरी पाना मुश्किल ही नहीं तकरीबन नामुमकिन है. यह अब मैं समझ चुका हूं.

Experiences of your internships? Any remarkable experience that shaped your career?

दरअसल मैंने इंटर्नशिप नहीं की है क्योंकि कैंपस सेलेक्शन के जरिए मुझे सीधे हिन्दुस्तान अखबार में सीधे नौकरी मिल गई थी. मैंने अपने करियर में पहली नौकरी का श्रेय कैंपस सेलेक्शन को दूंगा. इधर मैंने यह अनुभव किया कि मीडिया में दलितों की भागीदारी बिल्कुल न के बराबर है. पटना में हिन्दुस्तान में बतौर ट्रेनी सब एडिटर काम करने के दौरान एक बहुत वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार श्रीकांत जी ने बताया था कि उन दिनों मैं हिन्दुस्तान अखबार (पटना या बिहार संस्करण) में संभवतः पहला और पटना में दूसरा दलित पत्रकार था. इस अनुभव से मैंने जाना कि मुझ जैसे पत्रकारों की क्या जरूरत है. इस वजह से मैं वंचित समुदायों को स्वर देने के लिए तत्पर रहता हूं. इंडिया टुडे में मेरे प्रवेश के लिए मैं उसके तत्कालीन कार्यकारी संपादक दिलीप चंद्र मंडल को श्रेय दूंगा क्योंकि उन्होंने ही मुझे ऑफर किया कि इंडिया टुडे हिन्दी में उस वक्त एक जगह खाली है. फिर मैंने अप्लाई किया था और वहां की संपादक कावेरी बामजेई ने मेरा इंटरव्यू लेकर मुझे सेलेक्ट किया था. दरअसल मीडिया में एक दिक्कत यह है कि आपको पता भी नहीं चलेगा कि नौकरी कहां उपलब्ध है और जबतक कोई बताने वाला या नेटवर्क आपके पास नहीं है, आपको नौकरी मिलना मुमकीन नहीं. ऊपर से दलितों को तो अप्लाई करने के बाद भी इंटरव्यू के लिए आमंत्रित नहीं किया जाता है या टाल दिया जाता है.

You started your career at Hindustan Media Ventures Ltd. Please describe to us your role there. How did you manage to secure a job there?

मुझे हिन्दुस्तान अखबार के पटना कार्यालय में बतौर ट्रेन सब एडिटर नियुक्त किया गया था. हालांकि मुझे वहां रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई थी और मैं सिटी रिपोर्टिंग की टीम में था. मैं मुख्यतः शहर के नागरिकों की समस्याओं को लेकर रिपोर्टिंग करता था. मैं पहले ही बता चुका हूं कि हिन्दुस्तान की नौकरी मुझे कैंपस सेलेक्शन की वजह से मिली थी.

How much grades matter in securing a job in mainstream media? Tell us about other activities which play a major role in securing a job.

मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी पाने में अकादमिक अंक की कोई भूमिका नहीं है. बस आप पास हों, यह काफी है. मैं पहले की कह चुका हूं कि मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी पाने में आपकी जान-पहचान या नेटवर्किंग ही सबसे बड़ी भूमिका निभाती है. चूंकि मेनस्ट्रीम मीडिया में अपर कास्ट का वर्चस्व है, इसलिए उन्हीं के बीच नेटवर्क बन पाता है. इस तरह आपको नौकरी पानी है तो दो चीजें मायने रखता है एक कि आप अपर कास्ट के हों और दूसरा उसमें आपकी नेटवर्किंग हो. यही वजह है कि दलित और पिछड़ों की भागीदारी इसमें बहुत ही कम है. अगर आप छात्र हैं तो कैंपस सेलेक्शन से बहुत ज्यादा संभव है कि आप अपने मेरिट के दम पर मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी पा लें लेकिन उसमें भी रिक्रूटर को लगना चाहिए कि आप उसके सुटेबल हैं कि नहीं. इसलिए अगर आपको वहां नौकरी पानी है तो जरूरी है कि उनको पसंद आने वाली बातें करें. वरना उसके बाद तो नेटवर्किंग ही एक मात्र जरिया है. अब तो यह और भी कठिन होता जा रहा है क्योंकि विभिन्न मीडिया संस्थानों ने अपने-अपने जनसंचार स्कूल खोल लिए हैं और उसी के बच्चों को अपने यहां शुरुआती नौकरी दे रहे हैं. इससे वे अन्य मीडिया स्कूलों में कैंपस सेलेक्शन करना भी कम कर चुके हैं. हालांकि वेब पत्रकारिता के उभार के बाद इस क्षेत्र में नौकरियों की संभावना बढ़ी है.

Did you find that the IIMC had prepared you sufficiently for the many tasks you were required to execute during your internships and later at your Job?

हां, बिल्कुल. जनसंचार की तकनीकी और व्यावहारिक प्रशिक्षण के हिसाब से आइआइएमसी ने मुझे पर्याप्त रूप से तैयार किया. इसका फायदा मुझे मेरी नौकरी में मिला है. लेकिन एक दिक्कत यह होती है कि जो चीजें आपको थ्योरी में या मीडिया एथिक्स के तौर पर पढ़ाई गईं, मेनस्ट्रीम मीडिया में व्यावहारिक तौर पर ठीक उसके उलट होता है. ऐसे में अपनी पढ़ाई और मेनस्ट्रीम मीडिया में तालमेल बैठाने में थोड़ी दिक्कत आती है. दरअसल अब मीडिया में एथिक्स जैसी कोई चीज नहीं बची है. हालांकि तकनीकी प्रशिक्षण में आइआइएमसी खरा उतरा है.

You are working at India Today since 2013. Tell us your experiences there. How would you describe your present job?

इंडिया टुडे देश की अग्रणी न्यूज-मैगजीन है. पत्रिका होने की वजह से यहां उस तरह का दबाव आपको नजर नहीं आएगा जो अखबारों, चैनलों या वेबसाइट्स में होती हैं. ऊपर से यहां किसी तरह के आइडिया थोपे नहीं जाते. आपको आइडिया देने और एप्रूव होने पर स्टोरी करने की छूट मिलती है. इस लिहाज से यह काम करने को बेहतर जगह है. यही नहीं बल्कि पत्रिका होने की वजह से यहां का वर्किंग ऑवर भी फ्लेक्सिबल है. फिलहाल मैं यहां मुख्यतया एडिटिंग का काम देखता हूं, एजुकेशन तथा दलित और अन्य वंचित समुदायों पर रिपोर्टिंग भी करता हूं. खासकर नए ट्रेंड और डाटा के आधार पर नई प्रवृत्तियों को रिपोर्ट करने को लेकर उत्साहित रहता हूं. इंडिया टुडे हिन्दी की वेबसाइट से लेकर उसका फेसबुक पेज देखता हूं और ट्विटर-फेसबुक पर क्या ट्रेंड चल रहे हैं, इसकी साप्ताहिक रिपोर्टिंग भी करता हूं. कुलमिलाकर जर्नलिज्म को लेकर इंडिया टुडे का अनुभव बढ़िया रहा है.

What are the pros and cons of making career in print journalism in today’s digital world? And your take on discrimination in salary of Hindi and English journalists?

आज की डिजिटल दुनिया में करियर की संभावनाएं मुख्त रूप से न्यूज वेबसाइट्स में ही हैं. कई सारे प्रिंट अखबार या पत्रिकाएं या फिर उनके कुछ संस्करण बंद हो गए हैं और उनकी जगह वेबसाइट्स ने ले ली है. यह इस वजह से है क्योंकि वेब में लागत कम पड़ती है. आपको बस डेस्क पर कुछ लोगों को बिठाना होता है जो एजेंसी वगैरह से खबरें लेकर स्टोरी पब्लिश कर देते हैं. उसके अलावा इंटरनेट पर पाठकों की बढ़ती संख्या की वजह से भी मीडिया समूहों का फोकस अपने-अपने वेबसाइट्स पर है. इस वजह से प्रिंट में नौकरियों की छंटनी हो रही है और डिजिटल जर्नलिज्म में बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं. लेकिन इस खतरे के बावजूद प्रिंट की अच्छी बात यह है कि यहां आपको रिपोर्टिंग का मौका मिलता है. अगर आपकी रूचि रिपोर्टिंग में है तो प्रिंट आपको बेहतर मौका देता है वरना वेब जर्नलिज्म में रिपोर्टिंग के मौके फिलहाल न के बराबर हैं.

अंग्रेजी और हिन्दी पत्रकारों की सैलरी में काफी ज्यादा अंतर देखने को मिलता है. मसलन मेरे कैंपस सेलेक्शन के दौरान जहां हिन्दी में ट्रेनी सब एडिटरों को करीब 14,000-16000 के आसपास सैलरी ऑफर की गई थी, जबकि अंग्रेजी में यह 25,000 से शुरु ही हुआ था. जबकि दोनों तकरीबन एक ही काम और पद की जिम्मेदारी को निभा रहे होते हैं. संपादक सरीखे ऊंचे पदों पर तो यह फर्क बहुत ही ज्यादा है. मुझे लगता है कि इसका फर्क न केवल पत्रकारों की जिंदगी में बल्कि उनकी विभाग की क्वालिटी में भी पड़ता है. इस वजह से हिन्दी और अंग्रेजी में यह असमानता दूर होनी चाहिए.

How difficult is it to shift from Hindi Journalism to English; especially when one has gone to Hindi medium school, hails form a village and not excellent in English? Have you ever think of switching the language?

हिन्दी पत्रिकारिता से अंग्रेजी पत्रिकारिता में स्विच करना आसान तो नहीं है लेकिन नामुमकीन भी नहीं है. आप चाहे गांव से हो हिन्दी मीडियम से हों या अंग्रेजी मीडियम से, शर्त बस यही है कि आपको अंग्रेजी बोलना-पढ़ना-लिखना अच्छे से आना चाहिए. लेकिन अगर आप अंग्रेजी में बहुत अच्छे नहीं हैं तो फिर अंग्रेजी पत्रिकारिता में स्विच करना तो दूर हिन्दी पत्रकारिता में टिकना भी मुश्किल है. दरअसल हिन्दी पत्रिकारिता में भी अंग्रेजी जरूरी है क्योंकि अधिकतर संस्थानों में ट्रांसलेशन का काम भी करना पड़ता है. वेब जर्नलिज्म में तो खासकर ट्रांसलेशन का काम ज्यादा होता है. मैंने कभी अंग्रेजी पत्रकारिता में स्विच करने की नहीं सोची क्योंकि गांव से हिन्दी मीडियम के छात्र में जो झिझक होती है, वह आज भी मेरे अंदर है. हालांकि अंग्रेजी पत्रकारिता में कभी-कभी ज्यादा बेहतर काम देखकर स्विच करने का मन होता है.

What is your view on media becoming irresponsible and showing fact less episodes? 

दरअसल यह सोशल मीडिया का दौर है. लेकिन इस शोसल मीडिया के दौर में गलत खबरों या गलत तथ्यों को भी वायरल कर देना आसान हो गया है क्योंकि वहां कोई गेट-किपिंग नहीं होती है, जब तक कि बार-बार शिकायत न की जाए. ऐसे में अखबारों और चैनलों को इस सोशल मीडिया की तेजी से कदम मिलाकर चलने की चुनौती होती है. इस चक्कर में वह भी बिना तथ्य जांचे खबरें प्रसारित करने की भूल करता है. दूसरी चीज यह है कि मीडिया में सोर्स की भूमिका बहुत की संदेहास्पद कर दिया है. मसलन आपकी खबर का स्रोत क्या है और वह सही है या नहीं है, यह बताने की जहमत अब मीडिया, खासकर न्यूज चैनल नहीं उठाते. मसलन अब किसी खबर या प्रसारित वीडियो में आपको यह भी लिखा मिल जाएगा, “हालांकि हम इस वीडियो या खबर की पुष्टि नहीं कर सकते.” जब खबर या वीडियो की पुष्टि की ही नहीं फिर खबर क्यों चलाया जाए? यह साफतौर पर मीडिया का गैर-पेशेवर रवैया है.

Is there any role of ethics in today’s journalism or has it become totally market oriented?

नहीं, आज की मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता में एथिक्स जैसी कोई चीज नहीं रह गई है. यह किराने की दुकान या आउटलेट सरीखी हो गई है, पूरी तरह से मार्केट ओरिएंटेड. इसके अतिरिक्त सत्ता का दबाव तो इस पर रहता ही है. इसलिए अपवादों को छोड़े दिया जाए तो पत्रकारिता आज बाजार और सत्ता के अंग की तरह ही हो गई है. खासकर वंचित समुदायों के लिए तो इसमें कोई जगह नहीं है.

What would be your parting message to students who want to be at your place?

अगर आपमें पत्रकारिता को लेकर जुनून न हो, तो कृपया यहां न आएं. क्योंकि यह बाकी अन्य सामान्य करियर्स की तरह नहीं है. महज अपना करियर बनाना है तो आप किसी और फील्ड को चुन सकते हैं. अगर आपको लग रहा है कि इसके सिवाय और कुछ नहीं कर सकते तभी आएं. दूसरी बात कि अगर आप इसमें यह सोचकर आना चाहिते हैं कि आप समाज या देश की सेवा करेंगे तो यह आपकी भूल है, इसे अभी से ठीक कर लें. और अगर साफ कहूं तो, सबसे बड़ी बात यह कि अगर आप नेटवर्किंग में माहिर हैं, तभी इसमें अपने करियर को ऊंचाईयां दिला पाएंगे, वरना काफी ज्यादा मुश्किल होगी. कुल मिलाकर यह फील्ड ऐसा नहीं है जैसा कि यह आपको बाहर से नजर आता है, यह अधिकतर दफए मरीचिका ही साबित होता है. फिर भी अगर इसको लेकर जुनून है तो आपका स्वागत है.


This interview is taken by @alokanand To suggest an interview, feedbacks, comments you can write him at alok@acadman.in

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